विभिन्न लेखकों की पुस्तकों का विमोचन

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‘क्षितिज’ लघुकथा सम्मेलन का उद्घाटन माहेश्वरी भवन में शनिवार को संपन्न हुआ। अर्चना टावरी ने सरस्वती वंदना की। अतिथियों ने मां सरस्वती का माल्यार्पण किया। समारोह का शुभारंभ सतीश राठी ने स्वागत भाषण से किया। संचालनकर्ता पुरुषोत्तम दुबे ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। ‘क्षितिज-पैंतीस वर्षों का सफर’ का लोकार्पण बलरामजी ने और क्षितिज पत्रिका का विमोचन बलराम अग्रवाल ने किया। इस अवसर पर बलराम अग्रवाल की पुस्तक ‘परिंदों के दरमियान’ का विमोचन हिन्दी साहित्य समिति के प्रधानमंत्री सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने किया| रामकुमार घोटड़ की पुस्तक ‘स्मृति शेष : ठहराव में सुख कहां’, मासिक लघुकथा अखबार ‘लघुकथा टाइम्स’, जॉन मार्टिन की ‘सब खैरियत है’ आदि का लोकार्पण किया गया। 

लघुकथा को चित्रांकन और कोलाज द्वारा खूबसूरत अभिव्यक्ति दी गई। इस पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन और लोकार्पण भी किया गया। लगभग चालीस पोस्टरों के माध्यम से कई लघुकथाओं को प्रदर्शित किया गया।  इंदौर के बाहर से आए अतिथियों को इंदौर के बारे में बताए बिना इस सम्मेलन की परिकल्पना पूर्ण नहीं होती और न ही क्षितिज की पूरी जानकारी को इतने कम समय में उन तक पहुंचाया जा सकता है। अनुध्वनि द्वारा इन सबको एक वृतचित्र द्वारा प्रस्तुत किया, जिसमें इंदौर की राजबाड़ा छत्री, सराफा कपड़ा मार्केट आदि की झलक के साथ क्षितिज के सहभागी साथियों के विचारों की झलक थी।

मुख्य अतिथि ‘लोकायत’ पत्रिका के संपादक बलरामजी ने अपने वक्तव्य में खुशी जाहिर करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी ने लघुकथा को मान्यता दी है और चार साहित्यकारों को अकादमी में लघुकथा पाठ के लिए आमंत्रित किया और यही लघुकथा की स्वीकार्यता है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने इसे गद्य काव्य की संज्ञा दी तो इसे छोटी कहानी भी कहा गया। अंतर सिर्फ नाम का है। उन्होंने काव्यात्मक और अकाव्यात्मक लघुकथा लिखने वाले रचनाकारों के नाम का उल्लेख करते हुए इसके महत्व को प्रतिपादित किया।  साथ ही लघुकथाकारों की अन्य विधाओं में लिखने पर भी जोर दिया और अन्य विधाओं में स्थापित लेखकों की लघुकथाओं का उल्लेख करते हुए अपनी बात को स्थापित किया। लघुकथा के विभिन्न सत्रों में अतिथि विद्वानों के वक्तव्य हुए। पहले सत्र में बलराम अग्रवाल ने ‘लघुकथा : कितनी पारंपरिक, कितनी आधुनिक’ पर बात करते हुए कहा कि लघुकथा ने अब मजबूती पा ली है| समाज में जो चलन में है, वह ग्राह्य होकर परंपरा बन जाती है, लेकिन लघुकथा में कथ्य में नवीनता होना आवश्यक है। चर्चाकार चैतन्य त्रिवेदी ने कहा कि लघुकथा को समकालीनता की हकीकत को स्वीकार करना होगा। लघुकथा में शब्द और शक्ति का रिश्ता कद और परछाई का रिश्ता है। वहीं पुरुषोत्तम दुबे ने बताया कि आधुनिकता निरंतर है और इसके अभाव में परंपरा जड़ रूढ़ि बनकर रह जाएगी।

दूसरे सत्र में ‘हिन्दी लघुकथा : बुनावट और प्रयोगशीलता’ पर वक्तव्य देते हुए अशोक भाटिया ने कहा कि लघुकथा विवादास्पद, उपेक्षित और सवालों के घेरे में है। काव्य संक्षिप्त और सूक्ष्मता की ओर बढ़ता है जबकि गद्य विस्तार मांगता है। गद्य में संक्षिप्तता होना ठीक नहीं, लेकिन उसमें अनावश्यक विस्तार भी नहीं होना चाहिए। सीमा जैन ने कहा कि प्रयोग के बिना जीवन अधूरा है| पढ़ना-लिखना भी आवश्यक है, लेकिन मौलिकता बनी रहे।  योगराज प्रभाकर ने लघुकथा के लिए दृष्टि विकसित करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कथानक प्लाट है तो शिल्प आर्किटेक्ट, लेकिन आंख और कान खुले रखने पड़ेंगे|  अंतिम सत्र में नंदकिशोर बर्वे ने चुनिंदा लघुकथाओं को नाट्य रूप में प्रस्तुत किया।

-प्रेषक – कविता वर्मा 

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