इंदौर: देश के सबसे स्वच्छ शहर का दूसरा रूप

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विश्वभर में देश के शहर इंदौर ने स्वच्छता के दम पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है| शहर को साफ़ और सुंदर बनाने के लिए अधिकारी और कर्मचारी काफी मेहनत करते हैं, लेकिन अब स्वच्छता को लेकर शहर का दूसरा रूप भी आम नागरिकों के सामने आ रहा है| पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी आम नागरिकों से दुर्व्यवहार करते हुए नज़र आ रहे हैं| पुलिसकर्मी द्वारा किए गए दुर्व्यवहार का एक किस्सा इंदौर के निवासी ने सभी के साथ साझा किया|

पुलिसकर्मी कर रहे इज्ज़त का कचरा

बहुत मेहनत से रूम की सफाई कर दोस्त के साथ कचरा फेंकने गया था|  मेरी गलती बस यह थी  कि मुझे यह जानकारी नहीं थी  कि रास्ते में लगे डस्टबिन में कचरा डालना मना है|  वहां खड़े सज्जन (दरोगा चतुर्भुज जी नागर) ने पहले हमारी फ़ोटो खींची और हमने पूछा तो बोले कचरा डालना मना है तो हम बिना कचरा डाले ही वापिस आने लगे| इस पर उन्होंने न सिर्फ बदतमीजी से बात की  बल्कि कंधा और गाड़ी पर भी ज़ोर आजमाइश की|

हमारी जानकारी के अभाव के कारण हम चालान कटवाने के लिए तैयार थे, पर उनकी बेरुखी और दबंगई बेइज्जत करने वाली थी| उनके पास चालान काटने के लिए कोई पर्ची तक नहीं थी| 5-10 मिनट बाद दूसरे अधिकारी आए, जिन्होंने यह समझने तक की कोशिश तक नहीं की कि हमारा उग्र व्यवहार  नागरजी की दबंगई के कारण था| यहां तक कि श्रीमान सचिन नकवाल ने मुझे धक्का तक दे दिया  और धमकाने लगे| सब मिलकर कहने लगे..तुम पर इल्ज़ाम लगा देंगे कि तुमने शराब पी थी, तुमने गालियां दी थीं|

मौके पर मौजूद पुलिस भी उनकी इस गुंडागर्दी के सामने लाचार दिखी| मुझे समझाते हुए पुलिस वाले भाईसाहब बोले, जैसा ये कह रहे हैं कर लो, चालानी या कानूनी कार्रवाई में से एक तो होगी| जो भीड़ खड़ी है, कोई गवाही देने नहीं आएगी| ये लोग कोर्ट में कुछ भी साबित कर देंगे..लंबे फंस जाओगे|

मुझे चालान देने से कोई दिक्कत शुरुआत से ही नहीं थीं, लेकिन क्या कोई साधारण इंसान की कोई इज्जत नहीं है? उसे कोई भी सरकारी कर्मचारी बेइज्ज़त कर सकता है, हाथ उठा सकता है, लेकिन वह आदमी इस रवैये पर क्या आवाज़ तक नहीं उठा सकता?

मैं बस इतना चाहता हूं कि यह कल किसी और के साथ न हो, क्या पता उसने वह 500 रुपए कितनी मेहनत से कमाए होंगे और वह भी तब जब वह कचरा-पेटी में कचरा फेंकने गया हो, न कि कोई क्राइम करने| घटना के बाद आसपास के लोगों ने लगातार आपबीती बताई और यह बताया कि किस प्रकार कुछ कर्मचारियों का व्यवहार बेहद ही असहनीय हो गया है|

पहले निगम की गाड़ी दिन में दो-तीन बार आती थी, जो अब केवल एक बार आती है, वह भी दोपहर 12 से 1 के बीच| ऐसे में 9 से 5 की नौकरी करने वाला इंसान अपने कचरे को कैसे, कहां और कब फेंके? एक वृद्धा ने आज दोपहर में गाड़ी वाले से पूछा, कल पिछली गली तक आकर ही क्यों चले गए थे? ड्राइवर ने जवाब दिया, तीन बार गाड़ी भर गई थी, चार बार घूमने में हम घर जाने में लेट हो जाते हैं| तीन मंजिल कचरा लेकर उतरकर आई वह वृद्धा और आस-पड़ोस के सभी जन काफी इंतज़ार कर अपना-अपना कचरा लेकर फिर अपने घर चले गए|

राजबाड़ा में एक बच्ची ने आइस्क्रीम का रैपर गिरा दिया तो उससे 150 का फाइन मांगा गया| उसने शालीनता से माफी मांगते हुए रैपर उठाया और कहा, मैं इसे कचरापेटी में डाल देती हूं| तब उससे कहा गया कि वह तो डालना ही पड़ेगा, पर 150 रुपए भी देने पड़ेंगे| इस व्यवहार को जनचेतना में गिना जाएगा या जन भय अभियान में?

मैंने वह 500 रुपए  का चालान चेक किया, जिस पर जेल जाने की धमकी देकर मेरे मित्र के हस्ताक्षर करवाए गए|  उस पर वजह में लिखा है “बिना सैग्रिगेशन किया कचरा डालते पाए जाने पर|” पहली बात, कचरा डाला नहीं गया, वह अब भी हमारे पास है| दूसरी बात, पूरा कचरा सूखा कचरा है, ‘बिना सैग्रिगेशन’ वाली बात भी गलत है, जो बिना जांच के लिखी गई है| इस प्रकार इस चालान की क्या वैधता हुई  और कोई अशिक्षित या अल्पशिक्षित होता तो वह तो समझ ही नहीं पाता कि उसे कुछ बोलकर कुछ और लिख दिया गया?

-प्रांजल वशिष्ठ

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