चेतन काश्यप  : उम्मीदों पर बिल्कुल खरे नहीं उतरे

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यदि कोई जनसेवक अपनी तनख्वाह न ले तो उससे क्या शहर में उद्योग लग जाएंगे? किसी विधायक की हजारों करोड़ की संपत्ति होने से क्या शहर का विकास हो जाता है? कोई पैसे वाला अपने धर्म के नाम पर शहर के लोगों को 4 महीने मुफ्त भोजन करवाता है तो क्या इससे शहर में उद्योगों का वातावरण बनेगा? जब शहर का युवा रोजगार के लिए दूसरे शहरों में पलायन के लिए मजबूर है, शहर में कोई नया उद्योग नहीं आ रहा है, शहर में धूल के गुबार के बीच जनता का चलना मुश्किल हो रहा है तो शहर आखिर कहां आगे बढ़ रहा है? पिछले चुनाव में रतलाम की जनता ने एकजुट होकर एक उद्योगपति को शहर का विधायक बनाया इस उम्मीद में कि शहर में नए उद्योग लगेंगे, शहर का विकास होगा, लेकिन बदले में शहर को सिर्फ निराशा ही हाथ लगी।

विकास के नाम पर कुछ सड़कों के नाम गिनाए जाते हैं जबकि बाकी शहर में धूल के गुबार लोगों का सांस लेना भी मुश्किल किए हुए हैं। जिस मेडिकल कॉलेज का श्रेय लेने की कोशिश की जा रही है, उस कॉलेज को रतलाम लाने के असली सूत्रधार भी कोई और ही हैं। इन पांच सालों में न रतलाम में एक नया उद्योग आया, न रतलाम में किसी युवा को रोजगार मिला, न माही का पानी रतलाम लाने के कुछ प्रयास किए गए और न ही रतलाम को शासन द्वारा कोई बड़ी योजना हाथ लगी। मुफ्त में खाना खाकर और निजी स्वार्थवश इसके बाद भी कुछ लोग बेवजह विकास के फर्जी वादों के ढोल बजाए जा रहे हैं।

हकीकत यह है कि चेतन काश्यप जनता से बिल्कुल कट चुके हैं|  उन्हें भीड़, पसीने धूप और धूल से एलर्जी है। आधे से ज्यादा समय अपने उद्योगों को देने वाले के पास जनता के लिए समय बचेगा भी कैसे? धनकुबेर को जिताकर जनता ने शहर के विकास की जो उम्मीदें उनसे पाली थी, उस पर वे बिल्कुल खरे नहीं उतरे हैं। जनता की अदालत में इस बार फिर वो अपनी किस्मत आजमा रहे है लेकिन अब देखना दिलचस्प रहेगा की रतलाम की समझदार किसी ज़मीनी नेता को चुनती है या फिर किसी पद और पैसे के अहंकारी रवैये वाले उद्योगपति को?

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