X

औरतें… औरतें और औरतें

0

482 views

अगर प्रजनन से उत्पत्ति के सिद्धांतों को कुछ पल के लिए दरकिनार कर के सोचें तो समझना मुश्किल है कि अगर औरतें नहीं होती तो क्या होता? हम किन हालातों में जीते, कैसे रहते, कैसे बात करते और कैसे खाते-पीते? हमारा चलना, उठना-बैठना सब कैसा होता? आशंकित हूं कि उस स्थिति में हम होमोसेपियंस भी बन पाते या नहीं। अभी तो ऐसा लगता है, मानो हमारी जिंदगी बस औरतों के ईद-गिर्द ही मंडराती रहती है। हम खरगोश की तरह उसके आसपास फुदकते रहते हैं और अगर वह ही नहीं होती तो हम करते क्या।

चलिये ज्यादा महिन नहीं पीसते हैं, सीधे मुद्दे पर आते हैं। महिलाओं के न होने की स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही आता कि फिर हम देखते क्या? आंखें किसी काम की नहीं रह जाती। हमें तो 24 घंटे उन्हें ही देखने, ताडऩे, घूरने की आदत है। घर से निकलते ही स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, दुकान और वापस उन्हें छोडऩे की जिम्मेदारी हमारे इन्हीं नेत्रों ने ले रखी है। यह काम अगर होता ही नहीं तो दुनिया के आधे से ज्यादा लोग तो फोकट ही होते। कमर की लचक पर नजर ऊपर-नीचे करने को नहीं मिलती तो बेचारे करते क्या?

फिर बारी आती गालियों की। गालियों से औरतों को अपदस्थ कर दिया जाए तो उनका कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। गालियां किसी के परिवार की महिलाओं को नीचा दिखाने, उनसे अभद्रता की पराकाष्ठा पर जाने की धमकी का ही तो दूसरा नाम है। शायद गालियां देकर यह समझाने की कोशिश की जाती है कि तुम्हारी करीबी किसी स्त्री के साथ अगर ऐसा कर दिया तो तुम्हारा अपने ही लोगों के बीच में क्या मान-सम्मान रह जाएगा। तुम्हारी मर्दानगी खोखले बांस से अधिक क्या होगी। लड़ाई किसी से भी हो शाब्दिक आक्रमण भी उसके परिवार की स्त्रियों पर ही होता है। स्त्रियां ही नहीं होती तो सारे आक्रमण दोनों बैलों के सिंगों की टकराहट से अधिक क्या होते?

फिर संसार की सारी शॉपिंग का क्या होता? तमाम मॉल्स बेनूर हो जाते, टीवी के विज्ञापनों की सारी खूबसूरती हवा हो जाती। कितनी सारी चीजें जो सिर्फ महिलाओं को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं। उनके माध्यम से बेची जा रही हैं। हम तो अपने लिए दाढ़ी का ब्लैड भी महिला की शक्ल देखे बगैर खरीद नहीं पाते हैं। टेलीशॉपिंग, बीपीओ का सारा बिजनेस ही अंकुरित नहीं हो पाता। कौन हमें उटपटांग पॉलिसियों की सलाह देता, निवेश के नुस्खे सुझाता, अंडरवियर-बनियान खरीदने का सलीका देता।

संसार की सारी क्रिएटिविटी गड्ढे में चली जाती। अगर स्त्रियां नहीं होती तो फिर किसके फोटो मार्फ किए जाते? फर्जी अश्लील साइट बनाई जाती। किसे सविता भाभी बनाते? सोशल मीडिया पर उल-जलूल फोटो डालकर टिप्पणियां करते। किसका नंबर जुगाड़ कर वक्त-बेवक्त फोन लगाकर अनाप-शनाप बातें करते। सार्वजनिक शौचालयों से लेकर ट्रेन की बाथरूम में किस के नंबर लिखे जाते। पुरातत्व धरोहरों की दीवारों पर किसके नाम का कोयला घिसते। आकृतियां बनाते और उसमें अपनी कुंठाएं भरते। कॉपियों के पिछले पन्ने कितने नीरस होते।

सार्वजनिक जीवन भी छिन्न-भिन्न हो जाता। थियेटर में किस के बगल की सीट पर बैठकर जानबूझकर पैर टकराते। बस में हाथ दबाते, झटके से ब्रेक लगने पर किस पर उलट जाते। मंदिर की भीड़ में किसे धक्के मारते। उत्सवों में किसकी चुनरी खींचते, आंखें दबाकर इशारा करते, फब्तियां कसते। पार्क में दोस्त के पास बैठा पाकर सार्वजनिक संपत्ति समझ उसके पास अभद्रता करने पहुंच जाते।

त्योहारों का भी दम ही निकल जाता। किसके ऊपर सिमन भरे गुब्बारे फेंकते। जानबूझकर देर तक गालों पर रंग घिसते। पीछे से पटाखों की लड़ लगाते। अग्नि के चक्कर कटाकर सात जन्मों के लिए गुलाम बनाते। प्यार में धोखा देते। रस्म-रिवाज के नाम पर घूँघट में कैद करते। कोख में मारते और तीन शब्द दोहराकर आधी रात को घर के बाहर निकाल देते।

कुछ लोगों के लिए और भी बड़ी मुश्किल हो जाती। वे रोज शराब पीकर पिटाई किसकी करते। दहेज के लिए किसे प्रताडि़त करते, किसका बोझ उतारने के लिए कच्ची उम्र में ब्याह करते, रुपए की लालच में दोगुना उम्र के आदमी के पल्ले बांधते। घर का खर्च बचाने के लिए स्कूल छुड़ाते। किसे घर में कैद करके रखते। कैसे कपड़े पहने, कैसे नहीं इसकी नसीहत देते। किसे कोठे पर बैठाते, एस्कार्ट सर्विस कराते। कपड़े-बर्तन, चौके-चूल्हे में झोंककर शोषण करते। पूरा दिन काम कराकर निठल्ला घोषित करते।

आखिर में एक ही सवाल मन में आता है कि वास्तव में हमें स्त्रियों की आवश्यकता क्यों है? उन्हें क्यों इस संसार में रहना चाहिए? स्त्री ने हमारी दुनिया बनाई है, लेकिन क्या हम अब तक उसके लायक इस दुनिया को बना पाए हैं? हमारे आसपास सिर्फ औरतें हैं, लेकिन क्या औरतों के इर्द-गिर्द हम भी वैसे ही हैं।

एक बार कल्पना कीजिएगा, क्या अब भी औरतों के सपनों की दुनिया में पुरुष का अस्तित्व होता होगा। अगर सृष्टि को बनाए रखने की विवशता में दोनों का साथ जरूरी नहीं होता तो क्या सच में वह अपनी दुनिया में हमें बने रहने देना चाहती?

-अमित मंडलोई

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Share.
24