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चिल्लर की कीमत तुम क्या जानों रईस बाबू

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रईस बाबुओं की कहानी समझना बहुत ही आसान है। ये बड़ी-बड़ी होटलों में जाकर खाना खाते हैं, 500-500 रुपए की टिप देते हैं, लेकिन कभी गरीबों के लिए जेब से 100 रुपए नहीं निकालते। बड़े-बड़े मॉल में जाकर मुंहमांगे दाम पर चीजें खरीदकर अपना पर्स खाली कर देंगे, लेकिन ये प्राणी अक्सर छोटी दुकानों या सब्जी के पीछे 1 रुपए के लिए लड़ते दिख जाएंगे। ऐसे ही एक रईस बाबू का किस्सा मेरे जेहन में है, जिसे आज मैं आपके साथ साझा करने जा रहा हूं।

भोपाल से इंदौर सफर के दौरान अप्रैल की तपती गर्मी में जब मैं बस यात्रा कर रहा था, उस समय मेरी नजर बस की खिड़की से एक बच्चे पर पड़ी। उस बच्चे को मैले, फटे कपड़े और घिसे हुए चप्पल के तले देखकर मेरी आंखें नम हो गई। एक तरफ वह बच्चा उन घिसी चप्पलों के सहारे भीषण गर्मी में चिल्ला-चिल्लाकर पानी के पाउच बेच रहा था। वहीं दूसरी ओर मेरे बगल में काला चश्मा लगाए, ब्रांडेड कपड़े पहना एक रईस बाबू इस गर्मी से निजात पाने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहा था।

रईस बाबू की पानी की बोतल भी खाली हो चुकी थी, तभी उसने पानी के पाउच बेचने वाले उस बच्चे को बुलाया और उससे 5 रुपए के दो पानी के पाउच खरीदे। रईस बाबू के पास बड़े नोट तो काफी मात्रा में थे, लेकिन उस बच्चे को देने के लिए पांच का सिक्का नहीं था। थोड़ा ढूंढने पर रईस बाबू के पास से 10 का नोट निकला, तभी अचानक बस चल पड़ी और वह बच्चा 5 का सिक्का पाने के लिए बस के पीछे इस तरह भागने लगा मानों उस 5 के सिक्के में उसकी जिंदगी हो।

भागते-भागते बच्चे की सांस फूलने लगी, तभी मैंने अपने बैग से उस बच्चे को 5 रुपए का सिक्का फेंककर दिया। इसके बाद रईस बाबू ने मुझे धन्यवाद कहा, जिसका जवाब मैंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ दिया, लेकिन मेरी इस मुस्कान में उसके लिए घृणा के अलावा कुछ नहीं था।

वह 5 रुपए का सिक्का देने के बाद मुझे काफी अफसोस हुआ कि मुझे किसी को पैसा फेंककर देना पड़ा, लेकिन 5 रुपए पाकर बच्चे के चेहरे पर थकान के साथ जो मुस्कान दिखी, उसे देखकर मुझे सुकून मिला।

अक्सर हम बस में सफर करते वक़्त नाश्ता या अन्य सामग्री खरीदते हैं तो हम इन बच्चों को 50 या 100 का नोट थमा देते हैं। कई चौराहों पर समाचार-पत्र बेचने वाले लोगों और बच्चों के साथ भी ऐसा होता है| लालबत्ती होने पर खड़ी होने वाली गाड़ियों पर ये कुछ सामान बेचते हैं और पैसे के लेन-देन में ग्रीन लाइट होने पर लोग या तो पैसे दिए बिना ही चले जाते हैं या कम पैसे देकर चले जाते हैं | कई बार इन बच्चों के पास छुट्टे होते हैं, लेकिन कई बार नहीं भी होते हैं इसलिए जब भी आप बस का सफर करें या कुछ खरीदें तो अपने पर्स, बैग में चिल्लर जरूर रखें या फिर सामान लेने से पहले पूछ लें कि छुट्टे हैं या नहीं।

जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हमारे सामने चिल्लर की अहमियत कम होती जा रही है, लेकिन उन गरीब बच्चों के लिए आज भी चिल्लर की खन-खन किसी खजाने के शोर से कम नहीं हैं।

-ह्रदय कुमार नामदेव

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