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खामियों को दूर करने के प्रयत्न करें

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कुछ तो इस दुनिया में जीने का तसव्वुर पालते हैं

और कुछ परलोक, हूर-ओ-अंगूर में ग़म ढालते हैं..

बात वो जो आज, अब की, नक़द की, आनन्द की

ये ढोल दूर के लगे सुहाने, कल के सारे मुग़ालते हैं..

ये पंक्तियां जिसने भी लिखी है, कमाल लिखी है। शेर, नज्म, रुबाई, दोहे और कविता की यही खासियत होती है कि चंद लाइनों में जिंदगी का फ़लसफ़ा बयान कर देती हैं। गहरे से गहरे जज़्बातों को कुछ शब्दों में समेटकर कागज़ पर उकेर देना ही वह कला है, जो ग़ालिब, खय्याम, शेक्सपियर, कबीर, खुसरो जैसी शख्सियतों को आज भी लाखों दिलों में जिंदा रखे हुए हैं। कुछ पंक्तियां पढ़कर कभी महसूस होता है कि यह तो अपने ही दिल के जज़्बात हैं, जिन्हें व्यक्त करने का कोई उपाय हमारे पास नहीं था।

इन पंक्तियों का अर्थ जो मुझे समझ आ रहा है, वह यह है कि कुछ ही लोग हैं, दुनिया में जिन्हें सच में जीना आता है। विरले ही होते हैं वे जिन्हें न परलोक की फिक्र है न हूरों के सपने है। जो जीवन है इस समय है, अभी है और कोई भविष्य की उम्मीद नहीं है। वर्तमान क्षण का आनंद ही जिनके लिए सबकुछ है। जिनके लिए न अतीत के अंधड़ के कोई मायने है न भविष्य के ख्याली सुख के। बाकी हम सब इतने दुखों से भरे हैं कि हमें परलोक या फिर हूरों की उम्मीद ही जिंदा रखे है। आज तक तो जिन्दगी में कुछ मिला नहीं। इतने सालों में भी जब हाथ खाली है तो जीने का अर्थ ही क्या है, लेकिन कहीं कोई उम्मीद जरूर है। दिखाई नहीं दे रही वह लेकिन एक किरण जरूर है, एक आशा जरूर है कि भविष्य में कभी कुछ मिल सकता है। आज हाथ खाली है तो क्या कल भर भी सकते हैं। सिर्फ इतनी उम्मीद ही करोड़ों को जिंदा रखे है।

जब तक भविष्य है तब तक उम्मीद भी रहेगी, लेकिन कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं जहां भविष्य खत्म हो जाता है। हादसे या बीमारी से अगर कोई कोमा में चला जाए या जिंदगी इतने दुखों से भर जाए कि जीने में कुछ सार ही नजर न आए तो ऐसे में जिंदा रहना भी एक सजा बन जाता है। अगर इंसान की अच्छी उम्र हो गई है और बीमारी की हालत में जीने की इच्छा भी खत्म हो चुकी है तो उसे जबरदस्ती मशीनों और दवाइयों की मदद से सांसें देकर जिंदा रखने में भी क्या सार है? ये भी तो एक तरह की जबरदस्ती ही है। दुखों से भरी जिंदगी से तसल्ली के साथ प्राप्त मौत कहीं बेहतर है।

कल सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर जो फैसला सुनाया, उसका दिल खोलकर स्वागत किया जाना चाहिए। हजारों मरीज हैं, जिन्हें डॉक्टर जवाब दे चुके हैं, लेकिन बस मशीनों से उनकी सांसें चलाई जा रही हैं। कोर्ट के इस फैसले से कम से कम उन मरीजों के दुखों का अंत तो होगा। जब शरीर जीवन के लायक बचा नहीं है तो फिर बजाय दुखों को सहते जाने से इच्छामृत्यु बेहतर विकल्प है| इस बात पर सुप्रीम कोर्ट ने मोहर लगा दी है।

कुछ लोगों को फिक्र है कि इस नियम का दुरुपयोग हो सकता है, उनकी शंका वाजिब है, लेकिन सवाल है कि इस देश में ऐसा कौन सा कानून है, जिसका दुरुपयोग नहीं होता? हर परिस्थिति के दो पहलू हमेशा ही रहेंगे। खामियों को दूर करने के प्रयत्न किए जाने चाहिए, लेकिन सकारात्मक दृष्टि के साथ। कोर्ट के फैसले में भी कई बातें स्पष्ट कर दी गई हैं कि किन हालातों में इच्छामृत्यु मान्य होगी। हां, दिल्लगी के मरीजों को इस फैसले से खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि दिलजलों की तादाद इस देश में इतनी बड़ी है कि वे एक अलग देश बना सकते हैं। उन्हें इस नए कानून में कोई रियायत नहीं दी गई है। उन्हें तो दिल पर पत्थर रखकर भी जीना ही पड़ेगा। उनके लिए सिर्फ इतना कि -:

रास्ते खुद ही तबाही के निकाले थे हमने, 

कर दिया दिल अपना उस पत्थर के हवाले हमने, 

मालूम है क्या चीज़ है यह प्यार यारों, 

अपने ही घर को जलाकर देखें हैं उजाले हमने !! 

-सचिन पौराणिक 

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