एक शांत शहर, पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए ख़ास जगह

2

पुष्कर, छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा राजस्थान का एक शांत शहर| करीब 510 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पुष्कर की सुंदरता देखते ही बनती है। राजस्थान के अजमेर जिले के पश्चिमोत्तर में स्थित पुष्कर भारत के सबसे पुराने शहरों में से एक है।हिन्दू लोक कथाओं के अनुसार, भगवान ब्रहमा ने पुष्कर में आग की पूजा करने की प्रतिज्ञा की थी। यद्यपि उनकी पत्नी सरस्वती इस निर्दिष्ट समय में यज्ञ की पूजा करने के लिए उनके साथ मौजूद नहीं थी।

इससे झुंझलाकर ब्रह्माजी ने गायत्री, जो एक ग्वालिन थी, से विवाह कर उन्हें यज्ञ में बैठा दिया। सरस्वतीजी ने जब अपने स्थान पर दूसरे को देखा तो वे क्रोध से भर गईं। उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया कि पृथ्वी के लोग उन्हें भुला देंगे और उनकी कभी पूजा नहीं होगी किन्तु अन्य देवताओं की प्रार्थना पर वो पिघल गई और कहा कि ब्रह्माजी केवल पुष्कर में पूजे जाएंगे। इसी कारण यहां के अलावा और कहीं भी ब्रह्माजी का मंदिर नहीं है।

पुष्कर में एक तालाब है जिसे ब्रह्म सरोवर कहा जाता है। मान्यता है कि सारे तीर्थों का फल इस तालाब में स्नान करने के बाद ही मिलता है। पुष्कर की एक ख़ास विशेषता भी है। यहां एक ब्रहमा मंदिर, पुष्कर झील के किनारे पर स्थित है। यह भारत के कुछ मंदिरों में से एक है, जो हिन्दुओं के भगवान ब्रहमा को समर्पित है।

यहां भगवान ब्रह्मा को समर्पित दुनिया में केवल एक ही मंदिर है। यह मंदिर मूल रूप से 14वीं सदी में बनाया गया था। मंदिर में राजसी छवि वाले कमल पर विराजमान ब्रहमाजी की चार मुख वाली मूर्ति है, जिसके बाएं तरफ उनकी युवा पत्‍नी  गायत्री और दाएं तरफ माता सरस्वती (सावित्री) बैठी हैं।

पुष्कर के कुछ मुख्य दार्शनिक स्थल

पुष्कर लेक –

पुष्कर कस्बे में स्थित एक पवित्र झील है, जिसका हिन्दुओं के लिए बड़ा ही धार्मिक महत्त्व है। पौराणिक दृष्टिकोण से इस झील का निर्माण ब्रह्माजी ने करवाया था। झील के निकट ही ब्रह्माजी का मन्दिर भी बनाया गया है। इसलिए इसे ब्रह्म सरोवर भी कहा जाता है। पुष्कर झील के आसपास लगभग पाँच सौ हिन्दू मन्दिर स्थित हैं।

ब्रह्मा मंदिर –

बहुत कम मंदिर ऐसे हैं जो विशेषकर ब्रह्म आराधना के लिए समर्पित हैं। मंदिर की खासियत है इसका हंसरूपी शिखर जो गहरे लाल रंग का है।जगतपिता ब्रह्मा मंदिर राजस्थान में पुष्कर झील के किनारे स्थित है। हालांकि इस समय मौजूद मंदिर का स्थापत्य 14वीं शताब्दी का है पर यह मंदिर 2000 साल पुराना माना जाता है।

वराह मंदिर सभा-

वराह मंदिर, मूल रूप से 12 वीं सदी में बनाया गया था, लेकिन हठधर्मी मुगल सम्राट औंरगजेब द्वारा इसे ध्वस्त कर दिया गया। फिर पुन: इस मंदिर को सन् 1727 में जयपुर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाया गया था।

सरस्वती (सावित्री) मंदिर –

दूर पहाड़ों की चोटी पर विराजती हैं सावित्री, परमपिता ब्रह्मा की अर्द्धांगिनी सावित्री. लेकिन यहां सावित्री रूठी हुई हैं, नाराज हैं। यही वजह है कि ब्रह्मा के मंदिर से बिल्कुल अलग-थलग उन्होंने पहाड़ पर अपना बसेरा बनाया हुआ है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए पुष्कर में यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में पत्नी का बैठना जरूरी था, लेकिन सावित्री को पहुंचने में देरी हो गई। पूजा का शुभ मुहूर्त बीतता जा रहा था।  सभी देवी-देवता एक-एक करके यज्ञ स्थली पर पहुंचते गए।  लेकिन सावित्री का कोई अता-पता नहीं था।  कहते हैं कि जब शुभ मुहूर्त निकलने लगा, तब कोई उपाय न देखकर ब्रह्मा ने नंदिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ पूरा किया।  उधर सावित्री जब यज्ञस्थली पहुंचीं, तो वहां ब्रह्मा के बगल में गायत्री को बैठे देख क्रोधित हो गईं और उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे दिया।

सावित्री का गुस्सा इतने में ही शांत नहीं हुआ। उन्होंने विवाह कराने वाले ब्राह्मण को भी श्राप दिया कि चाहे जितना दान मिले, ब्राह्मण कभी संतुष्ट नहीं होंगे। गाय को कलियुग में गंदगी खाने और नारद को आजीवन कुंवारा रहने का श्राप दिया। अग्निदेव भी सावित्री के कोप से बच नहीं पाए। उन्हें भी कलियुग में अपमानित होने का श्राप मिला। क्रोध शांत होने के बाद सावित्री पुष्कर के पास मौजूद पहाड़ियों पर जाकर तपस्या में लीन हो गईं और फिर वहीं की होकर रह गईं। कहते हैं कि यहीं रहकर सावित्री भक्तों का कल्याण करती हैं।

पुष्कर में जितनी अहमियत ब्रह्मा की है, उतनी ही सावित्री की भी है. सावित्री को सौभाग्य की देवी माना जाता है. यह मान्यता है कि यहां पूजा करने से सुहाग की लंबी उम्र होती है. यही वजह है कि महिलाएं यहां आकर प्रसाद के तौर पर मेहंदी, बिंदी और चूड़ियां चढ़ाती हैं और सावित्री से पति की लंबी उम्र मांगती हैं ।

रंगनाथ जी मंदिर –

इस मंदिर का निर्माण 1823 में सेठ पूरनमल गनेरीवाल ने बनवाया था। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार ‘रंगजी’ को समर्पित है।इस मंदिर को द्रविड़ स्‍थापत्‍य शैली में बनाया गया है। एक ऊंचे गौपुरम के अलावा मंदिर में मुख्‍य प्रवेश द्वार पर दो द्वारपाल संरचनाएं भी हैं।

पाप मोचिनी मंदिर –

ये मंदिर पुष्कर के उत्तरी खंड में स्थित है। एक महान आध्यात्मिक महत्व होने के साथ ही एक शानदार वास्तुकला मंडप भी है। माना जाता है कि यहां देवी के दर्शन करने मात्र से ही सभी पापों का नाश हो जाता है।

पुष्कर अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और मंदिरो के अलावा यहां लगने वाले मेले के लिए भी प्रसिद्द है। यहां पर कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी आते हैं। राज्य प्रशासन भी इस मेले को विशेष महत्व देता है। स्थानीय प्रशासन इस मेले की व्यवस्था करता है एवं कला संस्कृति तथा पर्यटन विभाग इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इस मेले का मुख्य आकर्षण पशु मेला होता है। जिसमें पशुओं से संबंधित विभिन्न कार्यक्रम भी किए जाते हैं, जिसमें श्रेष्ठ नस्ल के पशुओं को पुरस्कृत किया जाता है। भारत में किसी पौराणिक स्थल पर आम तौर पर जिस संख्या में पर्यटक आते हैं, पुष्कर में आने वाले पर्यटकों की संख्या उससे कहीं ज्यादा है। इनमें बडी संख्या विदेशी सैलानियों की है, जिन्हें पुष्कर खास तौर पर पसंद है।

Share.