Talented View : प्रतिशोध सिर्फ दुश्मनों के खून से ही शांत

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कहते हैं कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती। सालों तक भी उसे सीधे पाइप में डालकर रखो, तब भी बाहर निकालने पर वह फिर से टेढ़ी हो जाती है। कुछ लोग (देश) कुत्ते से भी गए गुजरे होते हैं। कुत्ते की दुम भी एक बार सीधी हो जाए, लेकिन इनकी फितरत कभी नहीं बदल सकती है । पाकिस्तान और कश्मीरी आतंकवादी ऐसे ही उदाहरण हैं, जो कुत्ते से भी गए गुजरे होते हैं। कुत्ते की दुम सीधी हो सकती है, सांप काटना भूल सकता है, लेकिन ये अपनी हरकतों से कभी बाज़ नहीं आने वाले हैं। इनकी फितरत वही थी, वही है और वही रहेगी, लेकिन दु:ख इस बात पर होता है कि इनके शिकार हम हर बार क्यों बन जाते हैं?

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पठानकोट हमले के बाद देश के सुरक्षा सलाहकार डोभाल साहब ने कहा था कि ऐसा हमला अगली बार होगा तो पाकिस्तान के दो टुकड़े कर देंगे। हालांकि इसके बाद उरी हुआ और अब पुलवामा हो गया। देश अब भी कार्रवाई का इंतज़ार ही कर रहा है। नेताओं की बातों का कोई भरोसा नहीं, लेकिन डोभाल साहब के शब्दों से भरोसा खोना अच्छा संकेत नहीं है। प्रधानमंत्री ने कल देश से वादा किया था कि सशस्त्र बलों को खुली छूट दे दी गई है, लेकिन सवाल यही है कि यह खुली छूट क्या सिर्फ बदला लेने के लिए ही दी जाती है? हमारे वीरों का खून बह जाता है, उसके बाद ही हमें उनकी फिक्र क्यों होती है? सेना को खुली छूट 365 दिन नहीं दी जानी चाहिए?

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गृहमंत्री ने भी कल कहा कि कश्मीरी अलगाववादियों को मिली सुरक्षा रिव्यू की जाएगी। सवाल वही है कि जब सरकार के कार्यकाल को खत्म होने में कुछ महीने बचे हैं, तब ऐसे निर्णयों से क्या हासिल होगा? कोई भी सच्चा देशभक्त नहीं चाहता कि अलगाववादी नेताओं को किसी भी तरह की सुरक्षा दी जाए। ये वो दोगले हैं, जो खाते भारत का हैं, लेकिन गीत पाकिस्तान के गाते हैं। जिस थाली में खाते हैं, उसी थाली में छेद करने वाले इन गद्दारों को आखिर अब तक सुरक्षा क्यों दी जा रही थी? पाकिस्तान जाकर देश के दुश्मनों से मिलने वाले इन दोगलों के पासपोर्ट क्यों नहीं निरस्त कर दिए जाते?

ऐसे मौकों पर वह वाकया बरबस याद आ जाता है, जब कश्मीर में भीषण बाढ़ आई हुई थी। उस बाढ़ में देवदूत बनकर आई भारतीय सेना यासीन मलिक नाम के अलगाववादी को बचा लाई थी। समझ नहीं आता कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को इतनी बार क्षमा करके जो गलती की थी वही गलती हम बार-बार क्यों दोहराए जाते हैं? भला क्या ज़रूरत थी यासीन मलिक को बाढ़ से बचाने की? ऐसे जीतेंगे हम जंग? दुश्मन हमें मारने का कोई मौका छोड़ने को तैयार नहीं और हम मानवता, दया, क्षमा जैसे थोथे सिद्धांत ही ढोए जा रहे हैं।

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कश्मीरी पत्थरबाजों, अलगाववादियों और पाकिस्तानपरस्तों को नेस्तनाबूद किए बिना यदि हम सोचते हैं कि पाकिस्तान को हरा देंगे तो यह बहुत बड़ी भूल है। सुरक्षा बलों के मूवमेंट के दौरान आम ट्रैफिक रोकने का कानून है, लेकिन महबूबा सरकार ने यह ट्रैफिक फिर शुरू करवा दिया था, जिसकी वजह से यह हमला हो पाया, लेकिन इसमें क्या गलती सिर्फ महबूबा की है? महबूबा, जिनके समर्थन से सरकार चल रही थी, उनकी कोई गलती नहीं? कश्मीर में राज्यपाल शासन लगे 6 महीने हो गए तो वह कानून अब तक क्यों नहीं बदला गया? पुलवामा पर भावनाओं से इतर दिमाग से सोचा जाए तो कई गलतियां ऐसी हैं, जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है।

गलतियां सुधारनी भी ज़रूरी है और ऐसे हमलों को दोबारा होने से रोकना भी, लेकिन अभी सबसे पहले जो काम होना चाहिए वह है बदला। आतंकियों और उनके मददगारों को वह सज़ा देना चाहिए, जो बाकी दुश्मनों के लिए एक मिसाल बने। प्रतिशोध की यह भावना अब सिर्फ दुश्मनों के खून से ही शांत हो सकती है।

-सचिन पौराणिक

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