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अपनी-अपनी ज़रूरत, अपनी-अपनी सोच….

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राजनीति में कुर्सी कभी स्थायी नहीं रहती है इसलिए सभी राजनीतिक दल कुर्सी के मोह में नैतिकता को ताक पर रख देते हैं. वर्तमान में सभी दलों में देशभक्त कहलाने की होड़ मची है| कोई दल नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक के गुण गा रहा है, तो कोई दल इसे देश के लिए घातक बता रहा है. विडंबना यह है कि इन सबके बीच जनता पिस रही है| इस  मुद्दे पर कार्टूनिस्ट का नज़रिया|

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