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सब एक थैली के चट्टे-बट्टे…

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ज्यों-ज्यों चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है, वैसे-वैसे तमाम राजनीतिक दलों में आपसी होड़ बढ़ती जा रही है| ये होड़ है वास्तविकता से दूर झूठे वादे करने की| राजनीतिक दलों के वादे और उनके काम के बीच फ़ासला लगातार बढ़ रहा है| इससे आम लोगों में निराशा बढ़ रही है| राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता अपने निचले पायदान पर पहुंच चुकी है और तेज़ी से घट रही है|इस मुद्दे पर कार्टूनिस्ट का नज़रिया|

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