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Sunday, May 20, 2018

*कर्नाटक: युदियुरप्पा ने दिया इस्तीफा *सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए येदियुरप्पा *जनता के बीच में जाकर करूंगा काम *येदियुरप्पा ने माना जनता का आभार

टिप्पणी करने से पहले सोचें सौ बार…!

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“कौन बनेगी करोड़पति” से जब अमिताभ बच्चन की बुलंदी का सितारा एक बार फिर जगमगा उठा था, उस दौर में उनकी देखादेखी ऐसे अनेक शो टीवी पर दिखाई देने लगे थे जैसे अनुपम खैर का “सवाल 10 करोड़ का” या फिर गोविंदा का “जीतो छप्पर फाड़ के”। हालांकि इनमें कोई भी शो केबीसी को टक्कर नही दे पाया लेकिन तब भी गोविंदा के शो को दर्शको ने काफी पसंद किया था। ऐसे ही एक शो में सम्मिलित होने के लिए कवियों और फिल्मी हस्तियों को आमन्त्रित किया गया था। फिल्मो के एक कलाकार ने ( नाम भूल गया हूँ) कवियों पर कुछ भद्दी टिप्पणी करते हुए कहा था कि मैने जिंदगी में कभी कवि सम्मेलन नही सुना। इस पर एक कवि ने तीखा हमला करते हुए कहा जवाब दिया था कि- “हम फिल्मे देखते है इसलिए हम खुलकर इनकी तारीफ या बुराई कर सकते है। लेकिन अगर आपने किसी कवि को सुना ही नही तो आपको किसी तरह की टिप्पणी करने का कोई हक ही नही बनता।”

दर्शको की तालियों ने कविवर की बात का समर्थन किया क्योंकि सही भी है जब आप किसी को जानते ही नही तो बुराई कैसे कर सकते है? आप उन्हें जाने बगैर उनकी बातों का सही मतलब निकाल ही नही सकते। अंग्रेजी में भी कहते है “बिफोर क्रिटिसाइज़िंग ए मैन,वाक ए माइल इन हिज़ शू” मतलब किसी की निंदा करने से पहले उसके हालातो, परिस्थितियों और मानसिकता को जरूर समझना चाहिए।

कल से संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान पर बवाल मचा हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि सेना को जहाँ युद्ध के लिए तैयार होने में 6-7 महीने लग जाते है, स्वयंसेवक 3 दिन में तैयार हो जाएंगे क्योंकि उनके जीवन मे सेना जैसा ही अनुशासन है। उनके कहने का आशय सिर्फ इतना था कि अगर आपात परिस्थिति में युद्ध के लिए सैनिकों की जरूरत पड़े तो जहां आम आदमी को इसके लिए तैयार करने में महीनों लग जाएंगे वहीं स्वयंसेवक को सिर्फ 3 दिन, क्योंकि उनके जीवन मे भी सेना जैसा ही अनुशासन है। भागवत ने ये भी जोड़ा की अगर संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होता है तभी क्योंकि संघ एक पारिवारिक संगठन है।

अब इस बयान के विरोध में राजनीतिक दलों से लेकर अनेक संगठन  सामने आ गए है। कह रहे है संघ प्रमुख ने सेना का अपमान किया है। सवाल उठाने वाले वही है जो अपनी जिंदगी में संघ के किसी जनकल्याण के प्रकल्प से नही जुड़े, जिन्होंने कभी संघ की कार्यप्रणाली को समझा ही नही, जिन्होंने संघ के बारे में सिर्फ सुना ही है अनुभव कुछ नही किया। जो ये जानते भी नही की संघ का उद्देश्य क्या है, जो कभी किसी शाखा में गए नही, जो ये कल्पना भी नही कर सकते कि तपस्वी जीवन कैसे जिया जाता है, वो सभी आज संघ प्रमुख के बयान पर हंगामा मचा रहे है। अगर संघ के कामो और विचारधारा को ईमानदारी से समझा जाता तो कोई भूलकर भी स्वयंसेवको पर उंगली नही उठाता।

सवाल ये है कि सेना का अपमान क्या तब नही हुआ जब सेना से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे गए? जब एक नेता ने सेनाध्यक्ष को गली का गुंडा कहा था? जब कुछ कथित समाजसेवी सेना पर बलात्कारी होने का आरोप लगाते है? संघ प्रमुख के बयान पर हंगामा मचाने वालो को तब क्या सांप सूंघ गया था जब एक कश्मीरी मुफ़्ती ने देश के मुसलमानों से एक नया मुल्क मांगने की अपील कर डाली थी। भागवत पर देशद्रोह के मुकदमे की मांग करने वाले मुफ़्ती के बयान पर कहाँ मुह छुपाये बैठे थे? भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाने वाले जब खुले घूम रहे है तो संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन के प्रमुख के बयान को बिना समझे उन पर सेना के अपमान ऐसे घटिया इल्जाम कैसे लगाए जा सकते है?

संघ जैसी निस्वार्थ सेवा करने वाले संगठन की मिसाल पूरी दुनिया मे ढूंढना मुश्किल है। आज जहां मुफ्त में किसी से 2 घंटे भी काम कि उम्मीद नहीं रखी जा सकती,वही संघ के प्रचारक आजीवन अविवाहित रहते, तपस्वी जीवन जीते और बिना कोई वेतन लिए समाज और देश के लिये अपना जीवन खपाये जा रहे है। संघ प्रमुख के बयान को लेकर हल्ला मचाने वालो से सिर्फ इतना निवेदन है कि कुछ दिन तो गुजारिये संघ के किसी वर्ग में, कभी हो आइए निकट की शाखा में, कभी मिलकर देखिए किसी प्रचारक से। तब शायद आप समझ पाए की घर-परिवार, पद-प्रतिष्ठा से दूर रहकर, देश के किये जीना-मरना क्या होता है..

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