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रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होना जरूरी

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भारत में नौकरियों पर संकट एक बार फिर चिंता बनकर उभरा है| एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था में रोज़गार की वृद्धि वित्तीय वर्ष 2015-16 में 0.1% देखी गई, जबकि यह दर 2014-15 में 0.2% थी| यह नवीनतम डाटा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा समर्थित शोध परियोजना KLEMS इंडिया डाटाबेस की रिपोर्ट में देखा गया है| यह आंकड़ा आरबीआई की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है| उचित रोजगार के बिना विकास की समस्या भारत के लिए नई नहीं है। 2015-16 तक के 10 वर्षों में, KLEMS डेटाबेस के अनुसार रोज़गार की वार्षिक वार्षिक वृद्धि दर, केवल 0.53% रही है। लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति इससे भी बद्तर हो गई है| हैरानी की बात यह है कि सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर कम होने के बावजूद नब्बे के दशक में रोजगार दर बहुत अधिक थी।

भारत में रोज़गार की समस्या की स्थिति को इस बात से समझा जा सकता है कि रेलवे को लगभग 1 लाख से अधिक रिक्त पदों के लिए दो करोड़ से ज्यादा आवेदन प्राप्त हुए हैं| साथ ही ऑनलाइन पंजीकरण समाप्त होने के पांच दिन शेष हैं। सरकारी नौकरियों में बढ़ते आवेदनों की संख्या से यह बात तो पूर्णतः साफ़ हो जाती है कि देश में रोज़गार की हालत अच्छी नहीं है और एक बार तो देखने में यह भी लगता है कि निजी क्षेत्र भी रोज़गार मुहैया करवाने में असमर्थ हैं, परन्तु जब हम इस स्थिति का विश्लेषण करते हैं और निजी क्षेत्र में रोज़गार देने वालों से बात करते हैं तो पता चलता है कि उनके पास नौकरियां तो हैं, पर उन नौकरियों के लिए कौशलयुक्त लोग मौजूद नहीं हैं और इसका सीधा संबंध हमारी ज़र्ज़र होती शिक्षा प्रणाली से है |

आज हमारे देश में शिक्षण संस्थानों की कमी नहीं है, पर इनमें से कितने संस्थान ऐसे हैं, जो गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान देते हैं, जितना उनसे उम्मीद की जाती है | आज हम कोई भी रिसर्च रिपोर्ट उठाकर देख ले, उनमें एक बात समान रूप से देखने को मिलेगी कि हमारे देश के युवा को डिग्री तो मिल जाती है, पर कौशल आज भी ज़्यादातर शिक्षण संस्थानों से नदारद है|

2015-16 तक अपडेट किए गए आंकड़े बताते हैं कि रोजगार कई क्षेत्रों में गिर पड़ा है। ‘कृषि, वानिकी, मछली पकड़ने’, खनन, खाद्य उत्पाद, वस्त्र, चमड़े के उत्पादों, कागज, परिवहन उपकरण और व्यापार का निर्माण कुछ ऐसे क्षेत्रों में हैं, जिनमें रोजगार 2014-15 और 2015-16 दोनों में अनुबंधित हैं। अजीब बात यह है कि इन वर्षों में उच्च वृद्धि हुई, साथ में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2014-15 में 7.4% और 2015-16 में 8.2% वृद्धि हुई थी, लेकिन रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है| बेरोजगार विकास की बहुत ज्यादा चर्चा हुई है|

हाल ही में, अमेरिकी अर्थव्यवस्थावादी पॉल क्रुगमैन, जिन्होंने 2008 में नोबेल पुरस्कार जीता था, चेतावनी दी थी कि यदि भारत अपने निर्माण क्षेत्र को विकसित नहीं करता है तो वह बड़े पैमाने पर बेरोजगारी को खत्म करने में सक्षम नहीं होगा|

जहां दूसरे एशियाई देश जैसे जापान और चीन में आबादी बढ़ रही है वहीं भारतीय जनसंख्या में युवाओं का ज़्यादा मिश्रण एक अच्छा संकेत है, पर भारतीय अर्थव्यवस्था को उसके जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ, जिसमें युवाओं की आबादी अधिक है, नहीं मिलेगा| यदि युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होते हैं और इसके साथ-साथ अगर देश के युवा अपनी रोजगार क्षमता और कौशल क्षमता बढाने में अक्षम साबित होते हैं तो इतनी बड़ी युवा आबादी का कोई महत्व नहीं रह जाता है|

-यामिनी उपाध्याय 

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