X

महिला समर्थित कानूनों में अब भी कई खामियां! 

0

140 views

हर सरकार महिलाओं की बराबरी, शिक्षा, सुरक्षा, रोज़गार आदि को लेकर मौखिक प्रतिबद्धताएं जताती है। लेकिन, अगर देश के कानूनों में इस प्रतिबद्धता को ढूंढा जाए तो कह पाना मुश्किल है कि असहनशीलता औरतों के दमन को लेकर है या खुद औरतों की तरफ़! जैसे कि गोआ के हिन्दुओं के लिए बनाए गए एक कानून के तहत अगर महिला 25 साल की उम्र तक माँ नहीं बनती या 30 की आयु तक उसे कोई पुत्र नहीं होता, तो उसके पति की दूसरी शादी कानूनी रूप से वैध मानी जाती है। अगर पहली पत्नी की तरफ से अलगाव की पहल की गई और अगर उसका कोई पुत्र नहीं, तो पुरुष के दूसरे विवाह को ही मान्यता दी जाती है।

महिला व बाल अधिकारों पर काम करनेवाली वकील कीर्ति सिंह द्वारा लिखी और अगस्त 2013 में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में इस तरह के कई अन्य कानूनों का भी जिक्र है। ये कानून औरतों के अधिकार के खिलाफ़ हैं या उनकी राह में लिए मुश्किल खडी करके बेटियों की तुलना में बेटों को बढावा देते हैं। ऐसे ही अन्य कानूनी खामियों को यहाँ प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है :

यौनिक हिंसा के खिलाफ़ कानून 

कानून के एक हिस्से में ‘दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से की गई शिकायत’ के लिए महिला को सज़ा का हकदार ठहराने की बात की गई है। यह बाकी पूरे कानून को कमज़ोर बनाता है। इससे महिलाएँ शिकायत करने में और भी असुरक्षित महसूस करती हैं। असंगठित श्रम में जुटी औरतों के लिए भी इसमें कोई प्रावधान नहीं।

 वैवाहिक संपत्ति पर अधिकार  

तलाक के बाद महिला का ऐसी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है, जो उसके विवाहित काल के दौरान पति के नाम पर खरीदी गई हो। अपने पति से निर्वाह के लिए मिलने वाले जिन पैसों पर उसका हक है, उसे हाँसिल करने के लिए और लम्बे मुकदमों में उलझना पड़ता है, जिनमें आनेवाले खर्चों को वहन करना आसान नहीं। 2013 में महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि विवाह विच्छेद के बाद 71.4 फीसदी महिलाएँ अपने माता-पिता के घर लौट जाती हैं। जिनके बच्चे होते हैं उनमें से 85.6 फीसदी अपने बच्चों को भी पाल रही होती हैं। केवल 18.5 फीसदी महिलाएं ही खुद तलाक की माँग करती हैं। विलग और तलाकशुदा औरतों के साथ काम करती संस्थाएँ कहती आई हैं कि आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा के कारण भारत में बहुत कम ही औरतें तलाक लेने के लिए सामने आती हैं।

 विवाह और यौनिक हिंसा 

बलात्कार संबंधी कानून में हिंसा की सीमित परिभाषाओं और उसकी दूसरी कमियाँ चर्चा का एक बड़ा विषय है। जहाँ शादीशुदा होने पर बलात्कार (पत्नी की मर्जी के विरुद्ध पति द्वारा) का मुद्दा है, तो उसके लिए कोई सक्षम कानून नहीं है। वहीं अलग हुई पत्नी का बलात्कार करने पर केवल 2 से 7 साल तक की सज़ा का ही प्रावधान है, जो बलात्कार के अधिकतम दंड से भी कम है।

 दहेज विरोधी कानून 

अभी तक के आंकड़ों का औसत है कि हर 5 मिनट में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला से क्रूरता की जाती है। प्रति 61 मिनट में देश में किसी महिला की दहेज मामले में मृत्यु होती है और प्रत्येक 79 मिनट में दहेज निषेध कानून के तहत मामला दर्ज किया जाता था। इस कानून को इस तरह से परिभाषित किया गया है, जिससे लगता है कि लड़के वाले भी उसी तरीके से दहेज देने के लिए मजबूर और प्रताडित किए जा सकते हैं। यह स्थिति की सच्ची तस्वीर बिल्कुल नहीं। दहेज को उस धन-संपत्ति की तरह देखा गया है जिसे विवाह के सिलसिले में लिया-दिया गया हो। पर शादी के बाद के उन सभी मौकों को नज़रंदाज़ किया गया है जब लड़की के घरवालों से कई तरह की माँगें की जाती हैं। इस रिपोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि दहेज न तो महिलाओं के उत्तराधिकार हक की जगह ले सकता है और न ऐसी स्थिति वांछनीय है। दहेज केवल औरतों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत को गौण बनाता है।

 उत्तराधिकार संबंधी कानून 

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत पति की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति पर पत्नी का अधिकार बनता है। जबकि, औरतों के लिए यह अलग है। यदि उसे संपत्ति माँ या पिता से मिली है, तो उस पर हक बनता है पिता के उत्तराधिकारियों का। पति या ससुर से प्राप्त किए जाने पर पति के वारिस उस सम्पत्ति पर अपना हक समझ सकते हैं। यदि औरत की सम्पत्ति उसकी खुद की बनाई हुई है, तो उसकी मृत्यु के बाद उस पर पहला हक बनता है उसके पति और बच्चों का। इन दोनों के न होने पर ही सम्पत्ति उसकी माँ या उसके पिता के हिस्से जा सकती है।

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के हिसाब से औरत को मर्द को मिलनेवाली सम्पत्ति का आधा हिस्सा मिलता है। यानि अगर बेटा और बेटी दोनों मौजूद हैं, तो बेटी को एक और बेटे को सम्पत्ति के दो हिस्से मिलते हैं। ईसाई धर्म में जन्मे जो लोग उसके परंपरागत कानूनों के तहत नहीं आते उन पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू होता है। अगर किसी गैर-पारसी महिला ने किसी पारसी पुरुष से शादी की, तो उस पुरुष की सम्पत्ति पर पत्नी का कोई हक नहीं बनता, जबकि बच्चों को हकदार माना जाता है। पारसी महिला के गैर-पारसी पुरुष से विवाह करने पर बच्चों को पारसी नहीं माना जाता।

 लिंग जाँच निषेध कानून 

देश में लड़कियों के जन्म का औसत लड़कों के मुकाबले लगातार घट रहा है। सख्त कानून होने के बावजूद अभी इसमें ऐसा कोई विधान नहीं जिससे एक गर्भवती महिला के नियमित परीक्षण के दौरान हो रहे अल्ट्रासाउंड के ज़रिए करवाये जा रहे लिंग जाँच को रोका जा सके। भारतीय दंड संहिता में ‘गर्भपात’ की सज़ा से जुड़ी कुछ धाराएं हैं, जैसे यदि कोई महिला ‘स्वयं अपने गर्भ समापन के लिए ज़िम्मेदार हो’, तो उसे दोषी माना जा सकता है। इसके अलावा जनसंख्या नियन्त्रण के तहत केवल दो बच्चे होने पर सरकार ने जो फायदे देने शुरु किए उसका असर भी लड़कियों की भ्रूण हत्या पर पड़ा। दो बच्चे रखने की स्थिति में लोगों ने लड़कियों की जगह लड़कों को और वरीयता देनी शुरु कर दी।

 बाल विवाह प्रतिबंध 

बाल विवाह पर रोक होने के बाद भी कानून ने इसे अवैध नहीं ठहराया है। विवाह के लिए लड़की की आयु 18 और लड़के की उम्र 21 रखी गई है। इस अंतर को न तो कानून में समझाया गया है, और न इस फर्क की ज़रुरत थी। शादी के वक्त लड़की का 18 साल का होना ज़रुरी है। फिर भी कानूनी तौर पर ‘शादी’ के अन्दर अगर यौनिक संबन्ध बनाए गए हैं और लड़की कम से कम 15 साल की है, तो उसे बलात्कार नहीं माना जाएगा।

 बच्चों के संरक्षण का हक 

संविधान संशोधन के बाद हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत शादीशुदा महिलाओं को गोद लेने का बराबर हक है। लेकिन, यह सभी धर्म-समुदाय के लिए नहीं है। पर, वे आज भी अपने बच्चों की बराबर संरक्षक की हकदार नहीं हैं। प्राकृतिक अभिभावक आज भी पिता ही है।

एकता शर्मा 

 (लेखिका पेशे से वकील और महिला कानूनों की विशेषज्ञ हैं)

Share.
24