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खतरे की घंटी बज चुकी, अगर आप सुन सकें…

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एक बच्चे को स्कूल से यह कहकर निकाल दिया गया कि वह बहुत झगड़ालू है। दूसरे बच्चों से लड़ता-झगड़ता है, उन्हें मारता है। बच्चे के माँ-बाप स्वाभाविक तौर पर यह बात मानने को तैयार नहीं थे कि उनका बच्चा ऐसा कुछ कर सकता है। उनकी नजर में उनका बच्चा बहुत सीधा था। खैर, बच्चे को दूसरे स्कूल में डाला गया। कुछ दिन सब ठीक चला, लेकिन फिर वहां से भी शिकायतें आने लगी। एक दिन पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में बच्चे के अभिभावकों से कह दिया गया कि ये सेशन तो ठीक है, लेकिन अगले सत्र के लिए अपने बच्चे के लिए दूसरा स्कूल खोज लेना। बच्चे के अभिभावक फिर से स्कूल वालों पर ही नाराज हुए क्योंकि उनकी नजर में उनका बच्चा ऐसा कुछ कर ही नहीं  सकता था। बच्चे को अगले साल फिर नए स्कूल में दाखिला दिलाया गया। कुछ दिनों में उसकी फिर शिकायतें आने लगीं। एक बात अलग यह थी कि उस स्कूल के दूसरे बच्चे भी कम नहीं थे। एक दिन सबने मिलकर उस शरारती बच्चे को घेर लिया, उसको लात-घूंसों से बहुत मारा। वह पिटाई इतनी तगड़ी थी कि बच्चा अपनी सुधबुध के साथ सारी शरारतें भूल गया। उस दिन के बाद से वह बच्चा बदल गया। उसके अभिभावक भी हैरान हुए कि आखिर अचानक शिकायतें आनी बंद कैसे हो गई?

बच्चे में बदलाव आने का असली कारण सिर्फ उसे और उसको मारने वाले बच्चों को ही मालूम रहा। वैसे यह काम उसके माँ-बाप को करना था, लेकिन फिर भी उन बच्चों ने उसे मार-पीटकर उसका जीवन तबाह होने से बचा लिया। वे उसको नहीं सुधारते तो उसकी हरकतें बढ़ती ही जाती। इस प्रकरण के बाद से उस बच्चे में आया बदलाव वास्तविक था, वो बिल्कुल ही सुधर चुका था। उसकी कोई शिकायत सुनने में फिर कभी नहीं आई।

खुशनसीब होते है वे बच्चे, जिन्हें सुधरने का मौका मिलता है और जो सुधर भी जाते हैं। नहीं तो कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिन्हें मौके कई बार मिलते हैं, लेकिन वे चूक जाते हैं। उनकी गलती का खामियाजा फिर उनके माँ-पिता के अलावा समाज को भी भुगतना पड़ता है। म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों की हरकतों से त्रस्त होकर अमनपसंद बौद्धों ने उनको अपने देश से भगाना शुरू किया, जिस पर पूरी दुनिया में हल्ला मचा। मुस्लिम देशों ने रोहिंग्या की गलती मानने से ही इनकार कर दिया। उनको लग रहा है कि रोहिंग्या पर जुल्म किया जा रहा है। दूसरी खबर श्रीलंका से आ रही है, जहां एक बौद्ध युवक को घेरकर मारने का आरोप मुस्लिमों पर लगा और उसके बाद सिंहली बौद्धों ने मुस्लिमों पर सिलसिलेवार हमले शुरू कर दिए, जिससे श्रीलंका में आपातकाल लगा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम बिरादरी अब भी मुस्लिम कट्टरपंथियों की गलती मानने को तैयार नही है और अब श्रीलंका सरकार पर इसका दोष मढ़ा जा रहा है।

लेकिन सोचने की बात यह है कि आखिर ये सब हो क्यों रहा है? बौद्ध धर्म के अनुयायी बेहद शांतिप्रिय कहलाते हैं, लेकिन वे हिंसक हो रहे हैं तो उसके पीछे जरूर कोई बड़ी वजह रही होगी। उस वजह को ढूंढकर उस पर काम किए जाने की जरूरत है और यह काम बहुत जल्दी शुरू करना होगा नहीं तो कल म्यांमार था, आज श्रीलंका है और कल फिर किसी देश से इनके खिलाफ आवाज उठेगी तब क्या होगा? अगर यही आवाज़ दुनिया के बड़े हिस्से से एक साथ उठी तो खूनी संघर्ष रोक पाना किसी सरकार के बस का नहीं होगा।

विश्व समुदाय को इस बारे में गंभीर चिंतन की जरूरत है, क्योंकि म्यांमार और श्रीलंका से आने वाले संकेत एक गहरी चेतवानी लेकर आए हैं कि एक ‘वर्ग विशेष’ के खिलाफ गुस्सा उबल रहा है। इस गुस्से के अंदर हिंसा के बीज छिपे हुए हैं। दो सबक मिलने के बाद शरारती बच्चे की हरकतें अब भी नहीं सुधरती है तो इसका खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना पड़ेगा। खतरे की घंटी बज चुकी है अगर आप सुन सकें…

-सचिन पौराणिक

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