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भक्तों की ’अग्नि परीक्षा’

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पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को 16 बार युद्ध में हराया, लेकिन हर बार वह माफी मांग लेता और पृथ्वीराज उसे क्षमा कर देते। सत्रहवीं बार युद्ध में मोहम्मद गोरी जीत गया और उसने जीतते ही पृथ्वीराज की आंखें फोड़ दी, जिससे वे कभी युद्ध न कर पाएं। इस कहानी को सुनकर सभी को दुख होता है और मन में सवाल उठता है कि हमारे योद्धा इतने भोले थे क्या? यदि आप अपनी झूठी वाहवाही के लिए शत्रु को खत्म नहीं कर रहे हैं तो क्या अर्थ हुआ आपकी बहादुरी का? शत्रु को खत्म करना युद्ध का अंतिम लक्ष्य होता है। अब या तो क्षत्रिय का क्षमाधर्म निभाकर अपनी आंखें फुड़वा लें या नैतिकता को बाजू में रखकर शत्रु को नेस्तनाबूद कर दें। दो विकल्पों में क्या बेहतर है, कोई बच्चा भी बता देगा।

आपके थोथे उसूल जैसे ‘बिलो द बेल्ट’ प्रहार न करने के नियम तभी मान्य होते हैं, जब सामने वाला इस लायक हो। युध्द अगर नीच से है, तब बिना नीचता किए आप कभी युद्ध नहीं जीत सकते हैं। कृष्ण भगवान ने भी युद्ध नियमों की परवाह किए बगैर दुर्योधन की जांघ पर प्रहार करवाया था। कृष्ण भगवान सोलह कलाओं के स्वामी होने के नाते यह भली-भांति जानते थे कि नीति के भरोसे धर्मयुद्ध नहीं जीते जा सकते हैं। महाभारत में भगवान कृष्ण द्वारा कराई गई हिंसा को आज भी अहिंसावादी पचा नहीं पाते हैं।

कल समाजवादी पार्टी के एक नेता, जो अपनी विवादित टिप्पणियों की वजह से आए दिन चर्चा में रहते हैं, उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। उनके भाजपा में आते ही ‘भक्तों’ में तहलका मच गया। भक्तों पर बड़ी मुसीबत आन पड़ी कि कल तक जिसे जीभर के गालियां देते थे, उसे अपनी पार्टी में शामिल करना कैसे न्यायोचित ठहरा पाएंगे? भक्तों ने अपनी पार्टी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया और कसमें खा रहे हैं कि अब कभी किसी के बहकावे में नही आएंगे। पर्दे के पीछे का खेल जो भक्त नहीं समझ पा रहे हैं, वह यह है कि बात दरअसल एक राज्यसभा सीट की है। नरेश अग्रवाल यदि कुछ सपा विधायकों का समर्थन जुटा पाते हैं (जो कि वे निश्चित कर ही लेंगे) तो राज्यसभा में भाजपा की एक सीट बढ़ जाएगी। गुजरात की एक राज्यसभा सीट (अहमद पटेल वाली) पर मचा घमासान अभी ज्यादा पुराना नहीं हुआ है। पृथ्वीराज चौहान वाली गलती भाजपा के अभी के शीर्ष नेता बिल्कुल नहीं करना चाहते और करना भी नहीं चाहिए क्योंकि राजनीति में सब जायज है। यह हुआ एक पक्ष।

अब इस परिस्थिति का दूसरा पक्ष देखा जाए तो अतीत में भाजपा की अगुवाई में बनी अटल सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई थी। वाजपेयी ने सरकार गिरवाना उचित समझा बजाय जोड़-तोड़ करने के। आजकल जो सोनिया गांधी वाजपेयी को मोदी से बेहतर बता रही हैं, उसकी एक वजह यह भी है। आज की भाजपा वह भाजपा है, जो मात्र दो सीट जीतकर भी राज्यों (मेघालय) में सरकार बना रही है। कांग्रेस को इस पर उंगली उठाने का कोई नैतिक हक नहीं है क्योंकि पूर्व में वे भी सिर्फ 1 विधायक पर सरकार बना चुके हैं। आज की भाजपा का एकमात्र लक्ष्य सत्ता हासिल करना है, उसके लिए चाहे मुकुल रॉय (पश्चिम बंगाल) से हाथ मिलाना पड़े चाहे नरेश अग्रवाल से। भाजपा शायद पृथ्वीराज प्रकरण से सबक सीख चुकी है। वैसे भी आज की राजनीति में किसी दल से नैतिकता और शुचिता की उम्मीद ही बेमानी है।

2019 से पहले ऐसे कई मौके आएंगे, जब भक्तों की भक्ति की ‘अग्निपरीक्षा’ होगी। असली भक्त कंचन होकर निखरेगा तो नकली इस आंच को सह नहीं पाएगा

-सचिन पौराणिक

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