छद्म धर्मगुरुओं से बचे महिलाएं

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ईसाइयों में एक प्रथा है ‘कन्फेशन‘, जिसमें चर्च के पादरी के पास अकेले में जाकर लोग अपने अपराध बयां कर देते हैं। ऐसा माना जाता है कि कन्फेशन के बाद दिल हल्का हो जाता है। मनोवैज्ञानिक ढंग से सोचा जाए तो यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे हिन्दू इस आस्था के साथ गंगा में डुबकी लगाते हैं कि इससे सारे पाप धुल जाएंगे। गंगा के पानी में पाप धोने की कोई खूबी हो या न हो, लेकिन जिस विश्वास के साथ गंगा में डुबकी लगाई जाती है, वह विश्वास सच में मनुष्य को पापमुक्त कर देता है।

खैर, बात चल रही है ईसाइयों के कन्फेशन की तो यह भी एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग ही है, जिससे अपने अपराध को स्वीकार करने से दोबारा वही अपराध करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर यह एक अच्छा अभ्यास है, लेकिन केरल के एक चर्च में कन्फेशन करने आई एक महिला के साथ पादरी ने ही दुष्कर्म किया। केरल के कोट्टयम में एक महिला ने अपने अपराधों की स्वीकारोक्ति प्रभु के सामने करने की सोची, तब वहां उपस्थित पादरी ने इस बात का फायदा उठाकर महिला को ब्लैकमेल करना शुरू किया और फिर दुष्कर्म किया।

महिला के पति के अनुसार, इस पादरी से परेशान होकर जब महिला ने दूसरे पादरी की मदद मांगी तो उस पादरी ने भी वही घृणित कार्य महिला के साथ किया और उसका नंबर किसी दूसरे पादरी को भी दे दिया। ऐसा करते-करते उस चर्च के 5 पादरियों ने महिला के साथ कई बार दुष्कर्म किया और डराया-धमकाया भी। चर्च के सचिव का कहना है कि उन्हें पांच पादरियों के खिलाफ शिकायत मिली है और वे जांच के बाद उन पर कार्रवाई करेंगे।

खबर मीडिया में आए 3 दिन हो गए, लेकिन किसी मीडिया चैनल ने इस मुद्दे को उतनी उग्रता से नहीं दिखाया, जिस उग्रता और प्रमुखता से वे हिन्दू साधु-संन्यासियों को सवालों के निशाने पर लेते हैं। अभी दाती महाराज के मामले में हर चैनल ने न सिर्फ बाबा का इंटरव्यू किया बल्कि उनसे तीखे सवाल भी पूछे। कई लोगों ने इस बहाने सभी हिन्दू संन्यासियों पर निशाना भी लगाया, लेकिन बात जब ईसाई मिशनरी, चर्चों या फिर मौलाना और मस्जिद-मदरसों की आती है, तब सभी के सुर अचानक से बदल जाते हैं। सवाल यह है कि जब किसी एक मौलाना या पादरी की काली करतूत से पूरे मुस्लिम और ईसाई धर्मगुरुओं को निशाने पर नहीं लिया जाता तो कुछ पाखंडी बाबाओं के पकड़ाने पर सभी हिन्दू संतों को क्यों इसमें लपेटा जाता है?

यह बताना उचित रहेगा कि यहां दाती महाराज और बाकी अपराधी हिन्दू संतों की तरफदारी नहीं की जा रही है। अपराधी चाहे किसी भी धर्म-मजहब का हो, कानून अपना काम करे और दोषियों को सख्त सज़ा मिले, लेकिन हिन्दू संतों पर न्यूज़ चैनल अपने प्राइम टाइम में कवरेज करे और बाकी मजहब के अपराधी धर्मगुरुओं पर सिर्फ 2 लाइन की खबर चलाए, इस बात पर विरोध का स्वर मुखर होना ही चाहिए।

केरल की इस घटना से यह बात सिद्ध होती है कि धर्मगुरुओं का चोला ओढ़े कोई भी शख्स चाहे वह मौलाना हो,  पादरी हो या फिर कोई संत है तो आखिर इंसान ही। इंसान अच्छे भी होते है, बुरे भी। ऐसे में महिलाएं विशेष तौर पर इन छद्म धर्मगुरुओं के निशाने पर रहती हैं इसलिए महिलाओं को कहीं भी अपनी आस्था जाहिर करने से पहले कई बार सोच लेना चाहिए क्योंकि धर्म की चादर ओढक़र अधर्म का धंधा चलाने वाले शैतान हर मत-मजहब में मिल जाएंगे। किसी दुर्घटना होने के बाद चाहे अपराधी दुनिया के सामने बेनकाब हो जाए, लेकिन इससे एक महिला की आत्मा और विश्वास पर ज़ख्म पड़ ही जाते हैं। इस देश में कानून अपराध होने के बाद ही सक्रिय होता है इसलिए महिलाओं को स्वयं और अधिक सावधानी बरतने पर ध्यान देना होगा।

-सचिन पौराणिक

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