प्रदेश ‘कमल’ के पास रहेगा या ‘कमलनाथ’ के ?

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पांच राज्यों में हुए चुनाव के परिणाम कल घोषित होंगे। कई विश्लेषक इन चुनावों को सिंहासन यानेकी 2019 का सेमीफाइनल भी बता रहे है। मध्यप्रदेश के नतीज़ों को लेकर एग्जिट पोल भी भ्रम की स्थिति में हैं। कुछ पोल कांग्रेस तो कुछ यहां भाजपा की सरकार बनवा रहे है। लेकिन जनता के मूड को भांपना इस बार बहुत मुश्किल है। प्रदेश में हुई बंपर वोटिंग के बाद पक्ष-विपक्ष दोनो ही समझ नही पा रहे है की लामबंदी किसके पक्ष में है? बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत वैसे भाजपा के पक्ष में माना जाता है लेकिन इस बार ये सत्ता विरोधी लहर की वजह से भी हो सकता है। 15 साल से प्रदेश में शासन कर रही भाजपा अगर हारती है तो ज्यादा चौंकने की बात नही होगी।

व्यापम जैसा महाघोटाला, जनप्रतिनिधियों की लापरवाही और सत्ता का घमंड सर चढ़कर बोलना इसकी बड़ी वजह होगी। इसके अलावा शिवराजसिंह के ‘माई के लाल’ जैसे बड़बोले बयान भी जनता के गुस्से की एक वजह होगी। ‘आरक्षण प्रेमी’ और ‘घोषणावीर’ मुख्यमंत्री का ठप्पा जो उन पर लगा है उससे भी जनता उन्हें हटाने का मन बना चुकी है। इसके अलावा भाजपा नेताओं का अहंकारी रवैया की – ‘जनता उन्हें ही चुनेगी चाहे वो किसी को भी टिकट दे’ भी उन्हें भारी पड़ने वाला है। विकास के खोखले दावों के बीच मुख्यमंत्री की कई बड़बोली बातें अब भी जनता के मन में है। मध्यप्रदेश की धूलभरी सड़कों को अमेरिका से भी बेहतर बताने का दुस्साहस हो या सवर्णों को मुख्यधारा से अलग-थलग करने की साजिश, मामाजी की ये बातें जब भी याद आती है तो जनता का गुस्सा ताज़ा हो जाता है। नर्मदा किनारे शराबबंदी का ढोंग हो, नर्मदा बचाओ मुहिम हो चाहे संतों को कैबिनेट मंत्री पद देना, मामाजी की हर बात राजनीति से प्रेरित ही लगती है।

सच भी है की अगर भाजपा की सरकार ने प्रदेश का इतना विकास किया होता तो फिर चुनाव जीतने के लिये इतनी मशक्कत की, क्या जरूरत पड़ती? दूसरी तरफ कांग्रेस अगर इस बार भी मध्यप्रदेश हार जाती है तो उन्हें आत्ममंथन करना पड़ेगा कि आखिर वो कब चुनाव जीतने के लायक बनेंगे? सत्ता विरोधी लहर के बाद भी अगर जनता ने कांग्रेस को नकार दिया तो उन्हें रुककर सोचने की जरूरत पड़ेगी की राजनीति में उनकी पार्टी कितनी रसातल में जा चुकी है? एग्जिट पोल के नतीज़ों से उत्साहित कांग्रेस को ये भी सोच लेना चाहिए की अगर नतीजे मनमाफिक नही आये तो हार का ठीकरा किसके सर फोड़ना है? क्योंकि जीत का श्रेय सबको पता है की राहुल गांधी को ही मिलना है। एग्जिट पोल भले ही कांग्रेस को राहत दे रहे हो लेकिन भीतर से वो भी परिणामों को लेकर आश्वस्त नही है। उन्हें पता है की जनता ने एकमुश्त वोट कांग्रेस को नही दिए है।

जनता का भरोसा जीतने में वो अब तक नाकाम ही रहे है। अंदरूनी कलह और टूट से जूझ रही कांग्रेस के लिए चुनौतियां प्रदेश जीतने के बाद भी समाप्त नही होगी। मुखिया को लेकर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनो ही दावेदारी जता चुके है। इनके अलावा दिग्विजय सिंग, अजय सिंह जैसे नेताओ की महत्वाकांशा भी अभी बुझी नही है। इन सबके बीच ये तय है की कल आने वाले परिणामों की सुगबुगाहट में आज की रात पांच राज्यों के नेताओं को नींद नही आने वाली है। कल का सूरज बहुतों की राजनीति चमकाएगा और बहुतों की राजनीति पर ग्रहण लगा देगा। कल इस वक्त तक तस्वीर साफ हो जाएगी कि प्रदेश ‘कमल’ के हाथ मे रहेगा या फिर ‘कमलनाथ’ के? बाकी चार राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिज़ोरम और तेलंगाना में भी नई सरकार की राह प्रशस्त हो जायेगी। लोकतंत्र के उत्सव में जनता जीत का सेहरा किसके सिर बांधती है ये कल स्पष्ट हो जाएगा। तब तक के लिये इंतज़ार कीजिये और अटकलों का आनंद उठाइये।

– सचिन पौराणिक

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