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किन्नरों को आखिर क्यों वंचित रखा जाए?

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मुझे हमेशा यह आश्चर्य होता है कि किसी के यहां शादी हो या बच्चा या कोई भी खुशी का मौका हो, किन्नर न जाने कैसे यह सब पता कर लेते हैं और तुरन्त वहां पहुंच जाते हैं। उनका सूचना तंत्र इतना मजबूत होता है कि पड़ोस में रहने वाले वाले पोरवाल साहब, जिन्होंने अपनी बेटी की शादी शहर से दूर जाकर की, जिससे मोहल्ले में किसी को इस बात का पता न चले| उनके भी घर लौटते ही किन्नर उनके यहां आ धमके। नाच-गाने और ढोलक की आवाज़ सुनकर जब पड़ोसी इकट्ठे हुए, तब सबको खबर लगी कि बिटिया का ब्याह हो चुका है। पोरवाल साहब भी इस बात पर हैरान थे और न चाहते हुए भी उन्हें 2100 रुपए भेंट करने पड़े।

ट्रांसजेंडर शब्द हम अक्सर सुनते आए हैं, लेकिन उसका सही अर्थ शायद हमें नहीं पता। ‘ट्रांस’ का अर्थ है ‘उल्टा’ और ‘जेंडर’ यानी ‘लिंग।’ पैदा होने के साथ बच्चा या तो लड़का होता है या लड़की, लेकिन समय के साथ कुछ लोग ऑपरेशन द्वारा अपना लिंग बदलवा लेते हैं, मसलन लड़का ऑपरेशन द्वारा लड़की बन सकता है और लड़की भी ऑपरेशन द्वारा लड़का बन सकती है। ऐसे लोग ट्रांसजेंडर कहलाते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि किसी लड़की या लड़के में अपने से विपरीत लिंग के प्रति इतना आकर्षण होता है कि वे उसी रूप में पहचान बनाए रखना चाहते हैं। जैसे कोई लड़का लड़कियों की तरह रहे या फिर कोई लड़की लड़कों की तरह से अपने आप को पेश करे तो भी ये ट्रांसजेंडर कहलाते हैं।

होमोसेक्सुअल अर्थात समलैंगिक ट्रांसजेंडर से अलग होते हैं। पुरुष का स्त्री की तरफ और स्त्री का पुरुष की तरफ एक स्वाभाविक झुकाव होता है, लेकिन यदि पुरुष को पुरुष से और महिला को महिला से ही लगाव होता है, तब इन्हें होमोसेक्सुअल या लेस्बियन कहा जाता है। इसके अलावा एक श्रेणी और है, जिसमें आने वाले लोगों का झुकाव महिला और पुरुष दोनों की ही तरफ होता है, ऐसे लोगों को हेस्ट्रोसेक्सुअल या फिर बाइसेक्सुअल कहा जाता है।

आधुनिक विज्ञान और मनोवैज्ञानिकों के हिसाब से समलैंगिकता की प्रवृत्ति पैदाइशी होती है। इसमें न उन लोगों का कसूर है न माता-पिता और उनकी परवरिश का। दुनिया के कई देश ऐसे है, जहां  समलैंगिकों को  कानूनी दर्जा प्राप्त है और वे साथ में आराम से रहते हैं, लेकिन उसके बाद भी समलैंगिक समाज को भारत के जनमानस ने कभी खुले दिल से स्वीकार नहीं किया है।

समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली भारतीय संविधान की धारा 377 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कल फिर सुनवाई शुरू की। 9 जजों की बेंच में से 6 जजों की राय थी कि धारा 377 को अपराध के दायरे में लाने वाला पहले का फैसला गलत था। इसी वजह से समलैंगिक समुदाय को सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इस मुद्दे पर आज भी सुनवाई होनी है, जिस पर जजों की कुछ नई टिप्पणियां सुनने को मिलेगी, लेकिन इन सबके बीच बड़ा सवाल यही है कि इस तीसरे जेंडर के समाज के लोगों को अपना जीवन अपने ढंग से जीने का मौलिक और मानव अधिकार मिलना चाहिए या नहीं?

भारत जैसे देश में जहां आतंकवादियों, अपराधियों और हत्यारों तक के मानवीय अधिकारों की इतनी चर्चा होती है, जहां एक आतंकवादी के लिए सुप्रीम कोर्ट आधी रात को खुलवा लिया जाता है, जहां बलात्कारियों के मानव अधिकारों की बात करते हुए कुछ राजनीतिक दल नाबालिग बलात्कारियों को सिलाई मशीन और 10 हजार रुपए तोहफे में दे आते हैं, उसी देश मे समलैंगिकों और तीसरे जेंडर के सभी लोगों को मौलिक अधिकारों से आखिर क्यों वंचित रखा जाए? अपने हिसाब से जिंदगी जीने का अधिकार सभी को मिलना ही चाहिए। नैतिकता और धर्म या मज़हब के ठेकेदारों को अपना ध्यान बाबाओं, मौलवियों या पादरियों से मासूम बच्चियों को बचाने पर लगाना चाहिए न कि किसी के मौलिक अधिकारों का दमन करने पर।

-सचिन पौराणिक

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