कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी क्यों चुप हैं?

0

हवाई अड्डों पर सुरक्षा जांच में सबसे ज्यादा समय लगता है। इंदौर से दिल्ली या फिर मुम्बई की हवाई यात्रा का वास्तविक समय सिर्फ एक घंटे और कुछ मिनटों का है, लेकिन सुरक्षा जांच, सामान की क्लियरिंग और बोर्डिंग पास लेने में भी बहुत वक्त लग जाता है इसलिए फ़्लाइट के टिकट पर ही लिख दिया जाता है कि उड़ान के दो घंटे पहले हवाई अड्डे पर पहुंच जाएं।

हवाई अड्डे हमेशा ही आतंकवादियों के निशाने पर रहते हैं इसलिए वहां सुरक्षा जांच में कोई रियायत नहीं दी जाती है, जो कि सही है क्योंकि आतंकवादी भले ही साल-दो साल में कभी एक बार हमला करें, लेकिन सुरक्षा में थोड़ी भी चूक उनका काम बेहद आसान बना सकती है। किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं होता कि वह आतंकी है या फिर उसके सामान में बम रखा हुआ है इसलिए सुरक्षा एजेंसियां सभी को शक की निगाह से देखती हैं और बाकायदा स्कैनर से जांच करती है। स्वाभाविक तौर पर आतंकी हमलों से बचने के लिए होने वाली इस जांच में आम आदमी का बहुत वक्त ज़ाया होता है, लेकिन इसका कोई विकल्प नहीं है और यह अति आवश्यक है।

कल कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा बलों की आतंकवादियों के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई में आम लोग भी निशाना बना दिए जाते हैं। उनका कहना है कि 4 आतंकवादियों को मारने में 20 नागरिक मारे जाते हैं। उनका यह भी कहना है कि आतंकवादियों के बहाने सशस्त्र बल आम नागरिकों को भी निशाना बनाते हैं। इस पर आतंकी संगठन लश्कर ने भी एक बयान जारी करके कहा कि वे गुलाम नबी आज़ाद के बयान से पूरी तरह सहमत हैं और उसका समर्थन करते हैं। कश्मीर में आतंकवादियों और कांग्रेस की एक सुर में बोली गई इन बातों पर कांग्रेस की देशभर में किरकिरी हो रही है।

गुलाम नबी वही नेता हैं, जिन्होंने एक बार कश्मीर पर बुकलेट जारी करते हुए हमारे कश्मीर के हिस्से को ‘इंडिया ऑक्युपाइड कश्मीर’ अर्थात भारत के क़ब्जे वाला कश्मीर लिख दिया था, लेकिन हंगामा मचते ही इसे प्रिंट मिस्टेक बता दिया गया। इसके अलावा कांग्रेस के ही एक बड़े नेता सैफुद्दीन सोज़ ने भी यही राग अलापते हुए कश्मीरियों की आज़ादी का समर्थन कर दिया। अब नबी और सोज़ के बयानों पर कांग्रेस को जवाब देते नहीं बन रहा है और हमेशा की तरह इसे निजी बयान बताकर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है।

नबी के अनुसार, आतंकियों पर कार्रवाई में नागरिकों की मौत नहीं होनी चाहिए। उनका विचार उत्तम है, लेकिन फिर उनको बताना चाहिए कि यदि यही नागरिक आतंकवादियों की ढाल बनेंगे तो सेना को क्या करना चाहिए? पत्थरबाज और कश्मीर के नागरिक आतंकवादियों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं तो इन लोगों को देखकर सेना को आतंकियों पर गोली चलाना बंद कर देना चाहिए क्या? जब आतंकी कहीं हमला करेंगे तो उनसे सेना निपटेगी या फिर गुलाम नबी और सैफुद्दीन जैसे कांग्रेस के नेता? आतंकियों के निशाने पर नबी, सोज़ जैसे नेता और हजयात्री नहीं बल्कि सुरक्षा बल और अमरनाथ यात्री होते हैं। कश्मीर में मजहब की आड़ में आतंक का नंगा खेल खेला जा रहा है और गुलाम नबी को देश के सुरक्षा बलों की जगह पर पाकिस्तान समर्थक पत्थरबाजों और आतंकियों की चिंता सता रही है?

यदि आप आतंकवादियों का साथ दोगे तो भारतीय फ़ौज की गोली आप तक पहुंचेगी ही सही, यह बात कश्मीरियों को समझ लेना चाहिए। रही बात आम नागरिकों की तो कश्मीर में इस समय युद्ध के हालात हैं| इन हालातों में कुछ बेकसूर भी मारे जाते होंगे, यह बात सच हो सकती है, लेकिन इसका कुछ नहीं किया जा सकता है । कुछ आतंकी वारदातों के कारण जब देशभर के हवाई अड्डों पर आम नागरिकों का ही सबसे ज्यादा वक्त ज़ाया होता है तो आतंकवादियों के साथ कुछ नागरिक मारे जाएं तो इसके लिये ऑपरेशन नहीं रोका जा सकता है। यह सदा से ही होता आया है कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता ही है।

मुद्दे की बात यह है कि आखिर कांग्रेस के नेता आतंकवादियों की भाषा क्यों बोल रहे हैं? भाजपा का विरोध, मोदी का विरोध ठीक है, लेकिन देश की सेना पर सवाल उठाने से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिलेगा, बल्कि देश के लोगों में इससे गुस्सा भड़कता है। जम्मू-कश्मीर सरकार का गठबंधन टूटने के बाद सभी सवाल भाजपा से पूछे जाने चाहिए थे, लेकिन 2018 के अभी चल रहे फुटबाल विश्वकप के नाइजीरिया-क्रोएशिया मैच की तरह कांग्रेस के इन नेताओं ने नाइजीरिया टीम की तरह सेल्फ गोल करके सारे सवालों का रुख अपनी ही पार्टी की तरफ मोड़ दिया। अब कोई भाजपा से गठबंधन तोड़ने को लेकर सवाल नहीं पूछ रहा बल्कि अब यह पूछा जा रहा है कि ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान देने वालों पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी क्यों चुप हैं?

-सचिन पौराणिक 

Share.