एक खुशहाल परिवार ने क्यों किया ऐसा ?

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परिवार के साथ बैठकर कहीं घूमने जाने का प्लान बनाइये कभी। घूमने जाना बाद में होगा, लेकिन कहां जाना है, कब जाना है, कैसे जाना है आदि बातों पर ही घर में घमासान मच जाएगा। हर किसी की अपनी पसंद है। परिवार में किसी को पहाड़ पर जाना है तो किसी को समुद्र किनारे तो कोई जंगल या रेगिस्तान का शौकीन होगा। ऐसे ही यात्रा के लिए भी कोई कार, कोई ट्रेन तो कोई हवाई यात्रा को वरीयता देगा। ऐसा सिर्फ घूमने जाने में ही नहीं बल्कि घर की छोटी-मोटी बातों पर भी कभी घर के सभी सदस्य एकमत नहीं हो पाते हैं। किस दुकान से किराना का सामान खरीदने से लेकर कौन सी गाड़ी या कौन सा मोबाइल खरीदने जैसे विषयों पर भी सभी के विचार भिन्न ही होते हैं।

परिवार के सदस्यों के व्यक्तिगत मतभेदों की बात आज इसलिए करनी पड़ रही है क्योंकि कल दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 लोग अपने घर में मृत पाए गए। मरने वालों में बच्चे, जवान, बुजुर्ग सभी उम्र के सदस्य शामिल हैं। कल से कई लोग इस केस में आत्महत्या का एंगल तलाश रहे हैं क्योंकि परिवार के लोगों के व्यवहार की सभी पड़ोसी तारीफ कर रहे हैं। परिवार बड़ा सुलझा हुआ था, कोई भी जाहिर समस्या से भी नहीं जूझ रहा था और उनका किसी से कोई विवाद भी नहीं था इसलिए सभी का शक आत्महत्या की तरफ मुड़ रहा है, लेकिन घटना के बाद का जो वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है, उसे देखने के बाद लगता नहीं कि यह मामला सामूहिक आत्महत्या का रहा होगा। भरे-पूरे परिवार के सभी सदस्यों का यूं फांसी के फंदे पर झूल जाना कई सवाल खड़े करता है।

सवाल है कि आखिर कोई कैसे खुद के हाथ-पैर बांधकर फांसी पर झूल सकता है? और सभी लाशों की आंखों पर सफेद पट्टियां बंधी हुई थी, वह भी एक अज़ीब सी शक पैदा करने वाली परिस्थिति है। घटना के वीडियो को देखने पर यह स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है कि यह हत्या या फिर आत्महत्या जो भी है, लेकिन घटनास्थल पर किसी भी तरह के खून-खराबे, हाथापाई या फिर संघर्ष के निशान नहीं दिखाई दे रहे हैं। यदि इसे हत्या मानकर चला जाए, तब फिर हत्यारे ने बेहद शातिराना अंदाज़ में ये कत्ल किए हैं क्योंकि सभी शव ऐसे लटके हैं जैसे किसी ने बड़े इत्मीनान के साथ इस हत्याकांड को अंजाम दिया हो। हो सकता है परिवार के खाने में कुछ मिलाया गया हो, उसके बाद बेहोशी की हालत में सभी के गले घोटकर उन्हें लटका दिया गया हो। ऐसा लगता है कि जिसने भी इस वारदात को अंजाम दिया है, वह घर के सभी सदस्यों से परिचित था क्योंकि यदि कोई बाहरी शख्स ऐसा करता तो संघर्ष के निशान घर में जरूर छूटे होते, लेकिन ऐसा कुछ नहीं पाया गया है।

यदि सामूहिक आत्महत्या के कोण से घटना को देखा जाए, तब फिर सवाल वही है कि घर के सभी सदस्य आत्महत्या के लिए तैयार हो जाएं, यह बात हज़म करना मुश्किल है क्योंकि मरने वालों में बच्चे भी थे और बुजुर्ग भी। जीवन से वैराग्य एक समय में एक या दो सदस्यों को हो सकता है। छोटी-छोटी बातों में जब हर परिवार में मतभेद चलते रहते हैं और हर छोटे-बड़े निर्णय में सबकी सहमति नहीं बन पाती, ऐसे में सभी को आत्महत्या जैसे काम के लिए मनाना बहुत मुश्किल काम है। बच्चों में जीवन के प्रति रस होता है, उत्सुकता होती है इसलिए वे जीवन के इस प्रकार के अंत के लिए तैयार नहीं किए जा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में ऐसी विकृत मानसिकता बन जाती है और इंसान आत्महत्या कर लेता है, लेकिन सभी सदस्यों के एक साथ एक ही समय मे ऐसा होना मुमकिन नहीं लगता। यदि मान लिया जाए कि किसी एक शख्स ने सबकी हत्या करके खुद आत्महत्या कर ली हो तब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सबसे आखिरी में मरने वाले के हाथ-पैर किसने बांधे होंगे? ऐसी परिस्थिति में किसी बाहरी शख्स का इसमें शामिल होना अवश्यम्भावी प्रतीत होता है। सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, इसी का नाम ज़िंदगी है, लेकिन इस तरह खुद के या किसी और के जीवन का अंत किसी समस्या का समाधान नहीं है।

खैर, यह घटना आत्महत्या हो चाहे हत्या, लेकिन इसकी सच्चाई सबके सामने आनी बहुत जरूरी है क्योंकि यदि यह आत्महत्या है तो इस विषय पर गहन शोध की आवश्यकता है कि आखिर एक भरा-पूरा परिवार किस मानसिकता के प्रभाव में आकर ऐसा कर सकता है। वहीं यदि यह हत्या है तब भी हत्यारे के मानसिक स्वास्थ्य की जांच बहुत जरूरी है। 11 लोगों की हत्या एक साथ, एक ही तरह से करने के पीछे एक गहरी और सोची-समझी रणनीति रही होगी, इसमे कोई शक नहीं। पुलिस और जांच एजेंसियों को जल्दी ही इस कत्ल की गुत्थी सुलझा लेनी चाहिए जिससे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो सके।

-सचिन पौराणिक

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