ऐसे एकतरफा एक्ट की जरूरत क्या है?

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यहां पास ही मेन रोड पर एक जूते-चप्पल सुधारने वाला बंदा बैठता है। जिस दुकान के बाहर उसने अपनी गुमटी लगा रखी है, उस दुकान मालिक से गुमटी हटाने को लेकर उसकी कई बार कहासुनी हो चुकी थी। दुकान मालिक चाहता था कि गुमटीवाला अपनी दुकान यहां से हटा ले जबकि जूते सुधारने वाला वहां से हटना नहीं चाहता था। एक बार किसी दलित चिंतक या किसी ज्यादा समझदार शख्स ने उस गुमटी वाले बंदे को कुछ समझाइश दी।

अगली बार जब उन दोनों के बीच कहासुनी हुई, तब जूते सुधारने वाले ने दुकान वाले के खिलाफ जातिसूचक शब्दों से अपमान के जुर्म में इसी एससी-एसटी एक्ट में शिकायत दर्ज करवा दी। नतीजा यह हुआ कि गुमटी हटाने के झगड़े में, जिसका जाति से कोई लेना-देना ही नहीं था, उस दुकान मालिक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। आसपास वाले सभी जानते थे कि यह शिकायत झूठी है, लेकिन क्या करें? पुलिस हिरासत में जाने से दुकान मालिक की इज्जत भी गई और कुछ दिन बाद सुनने में आया कि एक बड़ी रकम लेकर जूते सुधारने वाले ने अपनी गुमटी वहां से हटा भी ली। मतलब मामला असलियत में क्या था, गलती किसकी थी, यह जाने बिना तत्काल गिरफ्तारी कर ली गई।

कल एस-एसटी एक्ट पर कुछ दलित चिंतकों के विचार आभासी दुनिया के पटल पर जानने की कोशिश की। देशभर में हुई हिंसा पर इनमें से किसी को कोई अफसोस नहीं है। अपने समाज के लोगों को सच्चाई से वाकिफ कराने की बजाय ये इन्हें भड़काने का ही काम कर रहे हैं। फर्जी खबरों का सहारा लेकर दलितों को यह समझाया जा रहा है कि सरकार आरक्षण को खत्म करना चाहती है इसलिए एससी-एसटी एक्ट में बदलाव किया जा रहा है जबकि हकीकत का इससे दूर का भी वास्ता नहीं है।

न्यायाधीशों ने साफ कहा है कि हमने इस एक्ट को छुआ तक नहीं है, सिर्फ पुलिस की शक्तियों पर लगाम लगाई है। न्यायपालिका यदि जेल में बंद बेगुनाहों की चिंता नहीं करेगी तो कौन करेगा? देश की राजनीति का यह दुर्भाग्य है कि दलितों की चिंता सभी कर रहे हैं, लेकिन कानून का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कोई एक शब्द नहीं कह रहा है और इस कानून का बेजा शिकार बने सवर्णों का तो कोई नाम भी नहीं ले रहा है? क्यों आखिर? सवर्णों के मानवाधिकार नहीं होते हैं क्या? कोई जन्म से सवर्ण है तो क्या उससे जीने का हक भी छीन लेना चाहिए?

किसी बेकसूर को जाति के नाम पर जबरन धमकाने के लिए, जबरदस्ती किसी की इज्जत को मिट्टी मिलाने के लिए यदि किसी कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है तो उसमें निश्चित तब्दीली की जानी चाहिए, लेकिन माहौल ऐसा बनाया जा रहा है जैसे यह एक्ट कोई मजहबी ग्रंथ के समान पवित्र है, जिसमें कोई बदलाव किया ही नहीं जा सकता, लेकिन देश को बंद करके उग्र विरोध करने से गलत बात सही साबित नहीं हो जाती है।

वोटबैंक की राजनीति ने देश को तबाह इसलिए कर रखा है क्योंकि इसमें एक पक्ष की गलत बातों को भी नजरअंदाज किया जाता है और दूसरे को बिना गलती के भी कसूरवार मान लिया जाता है। संविधान में जब लिखा है कि सभी नागरिक एक समान हैं तो फिर ऐसे एकतरफा एक्ट की जरूरत क्या है? सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में देश को बहुत उम्मीदें हैं, देखते हैं इन उम्मीदों का क्या होता है..?

-सचिन पौराणिक

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