Talented View : जाके पांव न फूटे बिवाई…

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राजनीति में क़िस्मत और काबिलियत का दूर-दूर तक आपस में कोई रिश्ता दिखलाई नहीं पड़ता। ऐसे कितने ही नेता हर पार्टी में मौजूद हैं, जिनकी जिंदगी गुज़र गई पार्टी की सेवा करने में, लेकिन कभी विधानसभा का मुंह देखना तो दूर कभी मंडल अध्यक्ष के पद तक भी न पहुंच सके। इसके उलट ऐसे उदाहरण भी अनेक हैं बल्कि ज्यादा चर्चित हैं, जिनके राजनीति में आगमन के साथ ही उन्हें विधायक या सांसद का टिकट और उसके बाद मंत्री पद चांदी की थाल में सजा हुआ मिलता है। मध्यप्रदेश में कैबिनेट तय होने के बाद अब विभागों का बंटवारा भी कर दिया गया है, लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस की आपसी कलह खत्म होती नज़र नहीं आ रही है।

हर अखबार में आज विभागों के बंटवारे के बाद एक सूची और छपी है, जिसमें यह बताया गया है कि कांग्रेस के किस खेमे को कौन-सा मंत्रालय मिला है? कमलनाथ खेमा, दिग्विजयसिंह खेमा और महाराज खेमा अर्थात ज्योदिरादित्य सिंधिया के कितने विधायक लालबत्ती पा सके हैं। इसके अलावा जिन विधायकों को लालबत्ती नहीं मिली है, वे अब भी हार मानने को तैयार नहीं है।

ऐसे ही मध्यप्रदेश के बदनावर से विधायक राजवर्धनसिंह दत्तीगांव ने अपनी पार्टी के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर दी है। बतौर दत्तीगांव, “मुझे मंत्रीपद या विधायकी से ज्यादा अपना सम्मान प्रिय है। महज 2लाख की विधानसभा में 45हजार वोट से बम्पर जीत जनता ने उन्हें मंत्री बनाने के लिए ही दी है। मेरे लोग अब मंत्री न बनाए जाने पर मुझसे सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन मेरे पास कोई जवाब नहीं है। महाराज ने मुझे टिकट दिलाया और अब मैं उन्हें ही अपना त्यागपत्र दे दूंगा। मेरे क्षेत्र के लोग ही खुश नहीं हैं तो मैं किस काम का विधायक? जिन्हें मंत्री बनाया गया, उनमें ऐसी कौन-सी काबिलियत है, जो मुझमें नहीं है?

दत्तीगांव की बात प्रथमदृष्टया बिल्कुल सही प्रतीत होती है, लेकिन सोचने वाली बात वही है कि काबिलियत राजनीति में सफलता की गारंटी है ही कहां ?  दत्तीगांव को सोचना चाहिए कि उनके अध्यक्ष राहुल गांधी खुद क्या अपनी प्रतिभा के दम पर कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं? उनके महाराज सिंधिया भी तो अपने पिता की विरासत ही संभाल रहे हैं। क्या खुद दत्तीगांव के पिता भी इसी क्षेत्र से 3 बार विधायक नहीं रहे हैं ? क्या पूरे बदनावर में उनसे काबिल कोई उम्मीद्वार नहीं था?

बात किसी पार्टी विशेष की भी नहीं है क्योंकि भाजपा चुनाव जीतती तो भी क्या आकाश विजयवर्गीय मंत्री नहीं बनते? ऐसे में जब सामान्य वर्ग के बच्चे सवाल पूछते हैं कि उनसे कम काबिलियत के छात्र को उनके स्थान पर नौकरी क्यों दी जा रही है तो कोई राजनीतिक दल या नेता उनका समर्थन क्यों नहीं करता? सामान्य वर्ग की भी यही तो मांग है कि प्रतिभा और काबिलियत को छोड़कर किसी अन्य पैमाने पर किसी गैर को नौकरी में वरीयता न दी जाए। ‘जिसकी जितनी काबिलियत उसकी उतनी हैसियत’ की तर्ज़ पर नौकरियां क्यों नहीं दी जाती है ? सरकारें खुद जनता को जात-पात की खाई में धकेलती हैं, फिर उनसे जनता से एकजुट रहने की उम्मीद भी करती है। क्या यह दोहरा रवैया नहीं है?

राजनीति में किस्मत, काबिलियत से ज्यादा मायने रखती है, लेकिन नौकरियों में भी क्या जाति, प्रतिभा से ज्यादा मायने नहीं रखती? आज दत्तीगांव को मंत्री नहीं बनाया जा रहा तो उन्हें काबिलियत याद आ रही है, लेकिन खुद उन्होंने राहुल गांधी के अध्यक्ष बनाए जाने का कोई विरोध किया था क्या? अपने दिल पर हाथ रखकर दत्तीगांव पूछे कि क्या 130 साल पुरानी कांग्रेस में आज सबसे काबिल नेता राहुल गांधी ही हैं? खुद की बारी आने पर सबको काबिलियत याद आ जाती है, लेकिन दूसरों के हक़ को जब मारा जाता है, तब चुप्पी क्यों साध ली जाती है? वैसे दत्तीगांव की मांग वाज़िब है, उनके जैसे हजारों नेताओं के साथ भी अन्याय हुआ होगा, लेकिन यहां तो आरक्षण के नाम पर पूरी पीढ़ी तबाह कर दी, तब किसी ने आवाज़ क्यों नहीं उठाई? ऐसे ही दोहरे लोगों और परिस्थितियों के लिए कहा जाता है कि- “जाके पांव न फूटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई”

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