ये जहर उगलना बंद नहीं करने वाले

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एक बार एक लड़के ने एक छोटा-सा अजगर पाला क्योंकि वह जानवरों से बहुत प्यार करता था। अजगर उसके साथ ही घर में रहता था। एक बार वह अजगर बीमार जैसा हो गया, उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया तो वह लड़का परेशान हुआ और उसे वेटरनरी डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने उसका चेकअप किया और उस लड़के से पूछा – क्या यह अजगर आपके साथ ही सोता है? उस लड़के ने बोला – हां,| डॉक्टर ने बोला, क्या यह आपसे बहुत सटकर सोता है ? लड़का बोला, हां ! डॉक्टर ने फिर पूछा, क्या रात को यह अपनी पूरी बॉडी को स्ट्रेच करता है?

यह सुनकर लड़का चौंका| उसने कहा – हां सर, यह रात को अपनी बॉडी को बहुत बुरी तरह स्ट्रेच करता है। डॉक्टर ने कहा, इस अजगर को कोई बीमारी नहीं है और यह जो रात को तुम्हारे बिल्कुल बगल में लेटकर अपनी बॉडी को स्ट्रेच करता है, वह दरअसल तुम्हें निगलने के लिए अपने शरीर को तुम्हारे बराबर लंबा करने की कोशिश करता है। वह लगातार यह परख रहा है कि तुम्हारे पूरे शरीर को वह ठीक से निगल पाएगा या नहीं और निगल लिया तो पचा पाएगा या नहीं।

कल जम्मू-कश्मीर की महबूबा सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और अब राज्य राष्ट्रपति शासन की ओर चल पड़ा है। इस कदम को भाजपा ने देशहित में लिया कदम बताया है, लेकिन भाजपा के राजनीतिक पंडितों को ये देशहित की बातें 3 साल महबूबा मुफ्ती के साथ गठबंधन सरकार चलाने के बाद ही याद क्यों आई है, यह बात समझना जरूरी है। रमज़ान के महीने में आतंकवादियों के लिए संघर्षविराम करना, इस बीच आतंकवादियों द्वारा सेना के जवानों के साथ पत्रकार और नागरिकों की हत्या होना और इन सबसे भाजपा की देशभक्त पार्टी की छवि खराब होना इस अलगाव की बड़ी वजह है।

हालांकि जब से भाजपा ने महबूबा का दामन थामा है, तब से यह बात सभी जानते थे कि यह गठबंधन दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का मेल है, जो ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला है, लेकिन 3 साल इस गठबंधन सरकार में रहने के बाद और रमज़ान में हुए ताज़ा संघर्षविराम का जब लेखाजोखा भाजपा के पंडितों ने बनाया होगा, तब उनको कश्मीर के हालात को लेकर देश की जनता में बढ़ रहे गुस्से की आहट सुनाई दी होगी। अगले साल देश में चुनाव हैं और कश्मीर में हुए संघर्षविराम से भाजपा की ‘राष्ट्रवादी’ छवि को गहरा धक्का लगा है। कश्मीर के पत्थरबाज और आतंकवादी वे अजगर है, जिनको कितने ही प्यार से अपने घर में जगह दो, ये हमेशा आपको निगलने की फिराक़ में ही रहेंगे।

भाजपा की अचानक जागी इस देशभक्ति के पीछे अगले साल देश में होने वाले आम चुनाव है, यह बात सभी को जान लेनी चाहिए। भाजपा का यह कदम देर से लिया गया दुरुस्त कदम कहा जा सकता है। प्यार, युध्द और राजनीति में सब जायज है, इसलिए भाजपा का यह कदम नैतिक तौर पर कितना सही है, इसका आकलन करना गैर जरूरी है। अब राज्य में राज्यपाल का शासन लागू होते ही आतंकवादियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन को तेज़ी मिलेगी। आतंकवादियों, अलगाववादियों और पत्थाबाज़ों पर सेना सख्ती से लगाम लगाएगी और भाजपा के नेता देशभर में सेना की कामयाबी का चुनावी फायदा उठाने में लग जाएंगे।

भाजपा के नेताओं का महबूबा के साथ मिलकर संघर्ष विराम का कायराना फैसला, जहां सशस्त्र बलों का मनोबल गिरा रहा था वहीं देशभर में पार्टी की राष्ट्रवादी छवि को भी इससे बट्टा लग रहा था। विचारणीय बात है कि भाजपा पर यदि संघ का डंडा न रहे तो सत्ता के लालच में ये कांग्रेस से भी ज्यादा बेशर्म साबित होते।

ग़नीमत ये है कि आतंक के अज़गर को बड़ा होने से पहले ही इस खतरे को भांप लिया गया नहीं तो यह अजगर जाने कितने और निर्दोष नागरिकों और सेना के जवानों को लील जाता। संतोष इस बात का है कि देर से ही सही, चुनाव जीतने के लिए ही सही केंद्र सरकार को समझ तो आया कि ये पत्थरबाज, अलगाववादी और आतंकवादी वो सांप के बच्चे हैं, जिन्हें कितना ही दूध पिला दो ये जहर उगलना बंद नहीं करने वाले हैं।

-सचिन पौराणिक

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