ये बात कुछ हजम नहीं हुई

0

आप पानीपुरी खाने जाते हैं तो क्या उस ठेले वाले से पहले उसकी जाति पूछते हैं? सड़क किनारे सब्जी खरीदने से पहले क्या हम उसकी जाति पूछते है कि भैया, तुम कौन जात हो? हम सिर्फ अच्छी सब्जी से मतलब रखते हैं या बेचने वाले की जाति से? ट्रेन में, बस में जब भीड़ होती है, तब क्या यह खयाल भी हमारे मन में आता है कि पास खड़ा शख्स किस जाति का है? सुबह से रात्रि तक कि दिनचर्या में हम जाने कितने लोगों से मिलते हैं, लेकिन किसी की जाति नहीं पूछते।

कहने का मतलब है कि जातिगत भेदभाव हम भारतीयों के मन हो सकता है, पहले रहा हो, लेकिन आज के जमाने में इन बातों से, विशेषकर युवा पीढ़ी को कोई लेना-देना नहीं है।

हां, लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जब किसी सवर्ण के बच्चे को इंटरव्यू में ज्यादा अंक लाने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती और आरक्षित वर्ग के युवा का कम काबिलियत के बाद भी चयन हो जाता है तो उस समय समाज में नफरत का एक बीज अंकुरित हो जाता है। जब दो व्यक्तियों का आपस में झगड़ा होता है और उनमें से अगर एक पक्ष आरक्षित वर्ग का है और वह थाने में जातिसूचक शब्दों से अपमान की झूठी शिकायत करके सामने वाले को एससी-एसटी एक्ट में अंदर करवा देता है, तब भी समाज में नफरत का बीज जन्म लेता है जबकि झगड़े का जाति से कोई लेना-देना ही नहीं था।

किसी केंद्र सरकार ने पहली बार इस नफरत के बीज को खत्म करने की दिशा में पहल की, लेकिन उसका इतना विरोध हो रहा है कि ऐसा लग रहा है कि सरकार को अपने कदम पीछे खींचना पड़ेंगे। सरकार ने सिर्फ इतना कहा कि एससी-एसटी एक्ट में किसी की तत्काल गिरफ्तारी की जगह पहले थोड़ी जांच होनी चाहिए, जिससे इस कानून का दुरुपयोग रोका जा सके। बस इतनी सी बात को ‘दलित स्वाभिमान’ और न जाने किन-किन बेतुकी बातों से जोड़कर इसका तीव्र विरोध होने लगा और इसी कड़ी में आज 2 अप्रैल को भारत बंद का आव्हान किया गया है, जिसका व्यापक असर भी देखा जा रहा है।

दहेज कानून का दुरुपयोग होने पर जब उसमें संशोधन किया जा सकता है| जीएसटी में कितनी बार संशोधन किया जा सकता है तो आखिर एससी/एसटी एक्ट में संशोधन क्यों नहीं किया जा सकता है? बहुजन समाज पार्टी और दलित नेताओं का काम ही इस जातिगत खाई को बढ़ाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना है, लेकिन असलियत में किसी भी तरह का भेदभाव तो उलटा सवर्णों के साथ हो रहा है। सवर्ण कॉलेज की फीस ज्यादा दे रहे हैं, ऊपर से उन्हें नौकरियां भी नहीं मिल रही, ऐसे में असंतोष किस वर्ग में व्याप्त होना चाहिए? विरोधाभास देखिए कि आज का ‘भारत बंद’ दलित संगठनों ने बुलाया है।

इंसान को आगे बढ़ना है तो आरक्षण की बैसाखी छोड़कर काबिलियत और प्रतिभा को बढ़ाना पड़ता है क्योंकि देख लीजिए उत्तरप्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री रह चुकी और दलितों की सबसे बड़ी ‘स्वघोषित मसीहा’ मायावती आज भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक शब्द भी बिना लिखे हुए पर्चे के नहीं बोल सकती हैं। जितना लिखा है, उससे एक शब्द भी न ज्यादा न कम।

खैर, इतना होने के बाद भी किसी वर्ग को लगता है कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है तो आरक्षित वर्ग की सारी सुख-सुविधाएं छोड़कर भी विरोध जताया जा सकता है और आरक्षण स्वैच्छिक रूप से छोड़कर भी। हर जगह सुविधा ले लेना और भेदभाव का आरोप लगाकर विरोध भी करना, ये बात कुछ हजम नहीं हुई। आपको हर जगह विशेष दर्जा चाहिए और फिर आप कहते है कि हमसे नफरत की जाती है तो साहब आप समस्या के मूल तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। सुधार की गुंजाइश कहां नहीं होती| ऐसे में यदि किसी कानून में सुधार किया जा रहा है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए, विरोध नहीं।

-सचिन पौराणिक

Share.