सत्ता के अलावा इनका कोई धर्म नहीं

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कर्नाटक में जब चुनाव प्रचार चल रहा था, तब सभी पार्टियां मंदिर-मठों में माथा टेकने और खुद को एक-दूसरे से बढ़कर हिन्दू साबित करने पर तुली हुई थीं। भाजपा हो या कांग्रेस या फिर जेडीएस सभी के नेता लिंगायतों के मठ में जाकर अपने आपको उनका हितैषी दिखाना चाह रहे थे, लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही सभी ने असली रूप दिखाना शुरू कर दिया है।

कल कर्नाटक के बीजापुर में एक कार्यक्रम के दौरान मंच से एक मौलाना ने हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली आपत्तिजनक बातें की। तनवीर पीर हाशमी नाम के इस शख्स ने खुले मंच से ही आने वाली बकरीद पर गाय की कुर्बानी देने की बात कही। इसके अलावा उन्होंने अपनी कौम को सबसे बड़ा बताते हुए इशारों-इशारों में कहा कि गाय की कुर्बानी से रोकने वालों को भी कुर्बान कर दिया जाएगा। ये सब भड़काऊ बातें जब की जा रही थीं, उसी मंच पर कर्नाटक के मंत्री शिवानंद पाटिल भी बैठे थे, लेकिन वे ये सब बेहूदगी भरी बातें चुपचाप सुनते रहे।

अब कुमारस्वामी और राहुल गांधी को इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करना चाहिए कि क्या वे भी उस मौलाना की कही बातों से इत्तेफाक रखते हैं? यदि हां तो चुनाव के पहले मंदिर-मठ में माथा टेकना और खुद को हिन्दू बताकर वोट मांगना क्या सिर्फ एक नौटंकी थी? राहुल गांधी को जवाब देना चाहिए कि गुजरात मे जनेऊधारी हिन्दू और शिवभक्त परिवार से ताल्लुक रखने वाला बताने वाले क्या इस मौलाना की बातों का समर्थन करेंगे? यदि नहीं, तब सवाल है कि खुद मंत्रीजी ने ऐसी भड़काऊ बातों का विरोध क्यों नहीं किया?

सवाल है कि क्या उस मौलाना पर धार्मिक भावनाएं भड़काने का केस नहीं दर्ज होना चाहिए? देश से भी बड़ा मजहब को समझने वालों के सामने जब बात मुल्क और मजहब में से किसी एक को चुनने की बारी आएगी तो वे बेशर्मी से देश को दगा नहीं देंगे? हिन्दुओं की गाय के प्रति भावनाएं जगजाहिर हैं। ऐसे में गाय को ही काटकर खाने की ज़िद क्या आपका अड़ियल और दंगा भड़काने वाला रवैया नहीं माना जाना चाहिए? सोचने वाली बात है कि आज पूरी दुनिया में कहीं भी दंगा होता है तो उसका एक पक्ष सदा मुसलमान ही क्यों होता है? जिस मुल्क के संविधान और संस्कृति में आपका भरोसा नहीं तो वहां रहने का क्या तुक बनता है?

सारे मुसलमान एक से नहीं होते, यह बात सही है, लेकिन यदि मुस्लिम खुद ऐसे दंगाई मौलाना का विरोध नही करते हैं तो सवाल उन पर भी खड़े होना वाजिब है। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। सद्भावना, भाईचारा और प्रेम तभी बना रह सकता है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करें। एकतरफा प्यार और बलिदान ज्यादा दिन नहीं टिक सकता। ऐसे फिरकापरस्त और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले मौलानाओं का विरोध बहुत जरूरी है नहीं तो परिस्थितियां बेकाबू हो जाएंगी।

राजनीतिक दलों और नेताओं की फितरत को भी जनता अच्छे से देख ले, समझ ले, जिससे अगली बार वोट के लिए ये आपके पूजास्थलों पर कभी नज़र आएं तो आपको पता रहे कि इनके साथ क्या सलूक करना है? ये नेता सिर्फ बरसाती मेंढक हैं, जो चुनावी बौछार होते ही जमीन से निकलकर आपको बेवकूफ बनाने के लिए आपके धर्म के रक्षक बनकर नौटंकी करने चले आते हैं, जिनका असलियत में वोट और सत्ता के अलावा कोई धर्म-मजहब नहीं होता है।

-सचिन पौराणिक

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