घर में नहीं है दाने….

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कुछ साल पहले अमृतसर जाने का मौका मिला था। स्वर्ण मंदिर और जलियांवाला बाग देखने के बाद हम वहां से निकल रहे थे, तब हमें बताया गया कि पाकिस्तान सीमा यहां से पास में ही है और शाम को अटारी बॉर्डर पर रोज़ अच्छा प्रोग्राम होता है, वह देखकर जाइयेगा। हमने सोचा ठीक है शाम को चलते है बॉर्डर देखने। अमृतसर से बॉर्डर करीब 20 किमी दूर थी। हम पहुंचे बॉर्डर पर तो वहां उत्सव जैसा माहौल था। कुछ सांस्कृतिक प्रदर्शनों के बाद परेड और उसके बाद भारत-पाकिस्तान दोनों देशों के झंडे साथ में उतारे गए। इस दौरान दोनों तरफ दर्शक दीर्घा में बैठे लोग लगातार अपने-अपने देश के समर्थन में नारे लगा रहे थे।

मेरे साथ वालों को यह सब बहुत पसंद आया, लेकिन मुझे न वह कार्यक्रम अच्छा लगा और न ही साथ में झंडा चढ़ाने-उतारने की परंपरा। जब हम जानते हैं कि पाक हमारा सबसे बड़ा शत्रु है| रोज़ हमारे जवान पाक द्वारा भेजे गए आतंकवादियों के हाथों मारे जा रहे हैं| ऐसे में इस परंपरा को निभाना मुझे बहुत बेतुका लगा। मुझे समझ नहीं आया कि जब हम एक-दूसरे के घोषित दुश्मन है तो ये दोस्ती निभाने का ढोंग क्यों किया जा रहा है? पाकिस्तान जैसा मौकापरस्त, दोगला देश क्या हमारे तिरंगे के बराबर सम्मान पाने का हकदार है? बराबरी का व्यवहार उसके साथ किया जाता है, जो इस काबिल हो। पाकिस्तान जैसे भिखारी मुल्क को हम क्यों इतना भाव दे रहे हैं? बात सामरिक ताकत की हो, आर्थिक ताकत की हो चाहे विदेशी संबंधों की, पाकिस्तान कहां टिकता है हमारे सामने? मैं यह यकीन करने को तैयार नहीं था कि हम पाक जैसे 2 कौड़ी के देश को भी बराबरी का दर्जा दे रहे हैं।

कहते हैं कि कुत्ते की दुम को यदि सालों किसी पाइप में डालकर रखो, तब भी वह टेढ़ी ही रहती है। कल यह खबर सुनने में आई कि वाघा बॉर्डर पर ऐसे ही एक समारोह के दौरान पाकिस्तान क्रिकेट टीम के गेंदबाज हसन अली ने इस समारोह के बीच में घुसकर भारतीयों की तरफ अभद्र इशारे किए और उकसाने वाली हरकतें की। पाकिस्तान की क्रिकेट टीम इस वक्त लाहौर में एक कैम्प कर रही है और लाहौर से वाघा बॉर्डर भी लगभग 22 किमी की दूरी पर है इसलिए उनके खिलाड़ी इस परेड को देखने बॉर्डर पर आए हुए थे। जिस तरह की बेहूदी हरकत हसन अली ने की है, उससे यह एक बार फिर सिद्ध हो गया है कि पाकिस्तान भी कुत्ते की दुम की तरह ही है। सालों साल भारत से मार खाने के बाद भी बेशर्मी जा नहीं रही इनकी।

हसन अली का यह दुर्व्यवहार प्रोटोकॉल का सरासर उल्लंघन है क्योंकि परेड के बीच में बीएसएफ के जवानों के अलावा किसी नागरिक को जाने की मनाही होती है। अली न सिर्फ जवानों के बीच पहुंच गए बल्कि भारत की तरफ उन्होंने उकसाने वाले इशारे भी किए। पाक रेंजर्स ने इस पर भी उन्हें नहीं रोका हालांकि बीएसएफ ने इस हरकत पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करवाया है।

पाकिस्तान की हालत इस समय दुनिया में एक भिखारी और आतंकवादी मुल्क की बनी हुई है। रही बात क्रिकेट की तो कोई भी देश अपनी टीम लेकर न पाकिस्तान खेलने जाना चाहता है और न ही उन्हें अपने देश बुलाना चाहता है। आईपीएल में पहले ही पाकिस्तानियों का बहिष्कार हो चुका है। पाकिस्तान के बोर्ड के पास इतने पैसे नहीं है कि वह अपने खिलाड़ियों को दे सके इसलिए वे फिक्सिंग में लिप्त होकर पैसे कमाते हैं। ऐसे गरीब देश के सट्टेबाज खिलाड़ियों से ऐसी ही जाहिल हरकतों की उम्मीद भी की जाती है क्योंकि वहां की जनता भी गंवार ही है। अली की इस हरकत पर वहां के लोग खुशी मना रहे थे।

अब हमें यह सोचने और फैसला लेने की जरूरत है कि क्या तुक बनता है ऐसी परंपराओं का? पाकिस्तानियों के पास मनोरंजन के साधनों का अभाव होने की वजह से वे यहां चले आते हैं, लेकिन हमारे पास क्या मनोरंजन की कोई कमी है? भारत बेहद विशाल और विविधताओं से भरा देश है, जहां हर जगह देखने में ये जिंदगी भी छोटी पड़ जाए। पाकिस्तान जैसे जाहिल देश को बराबरी का दर्जा देना हमारा बड़प्पन नहीं बल्कि बहुत बड़ी भूल है, जो हसन अली जैसे लोग बार-बार सिद्ध कर देते हैं। पाक की इस ताज़ा नापाक हरकत पर यही कहा जा सकता है  – ‘घर में नहीं है दाने और अम्मा चली भुनाने|”

-सचिन पौराणिक

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