चोरी, ऊपर से सीनाजोरी…

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बहुत साल पहले जॉन ग्रिशम का एक नॉवेल आया था ‘दी इनोसेंट मैन’| जब मैंने उसे पढ़ा तो उसके मुख्य किरदार ‘रॉन’ के लिए बहुत दुख हुआ। उस उपन्यास की कहानी कुछ यूं थी कि एक जवान लड़की के कत्ल के सिलसिले में एडा पुलिस ने गैर-पेशेवराना तरीके से खोजबीन की और दो निर्दोष लोगों के सिर इस हत्या का इल्जाम जड़ दिया। रॉन जो कि बेसबॉल खेलने का शौकीन था, उसे इस कत्ल का मुख्य अभियुक्त बना दिया जाता है और उम्रकैद की सजा सुना दी जाती है। वह बेचारा कुछ समझ पाता कि ये हो क्या रहा है उसकी जिंदगी में, उससे पहले ही वह सलाखों के पीछे पहुंच चुका था? उसका इस केस से सच में कोई लेना-देना नहीं था। आखिरकार 11 साल बाद जाकर डीएनए मैच किए जाते हैं और रॉन को बाइज्जत बरी कर दिया जाता है।

इन 11 सालों में उसके मन पर क्या असर हुआ, परिवार को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और कैसे एडा पुलिस की खराब जांच का खामियाजा दो बेगुनाहों और उनके परिवारों को भुगतना पड़ा, यह जॉन ने अपने उपन्यास में बहुत भावनात्मक रूप से वर्णित किया है। जो भी यह नॉवेल पढ़ता है, वह रॉन के लिए दुखी जरूर महसूस करता है। आज जॉन ग्रिशम का यह उपन्यास इसलिए याद आ गया क्योंकि कल यह खबर आई कि 11 साल पुराने मक्का मस्जिद ब्लास्ट केस में अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्वामी असीमानंद सहित 5 आरोपियों को बरी कर दिया।

इसी केस का हवाला देकर कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी पर निशाना साधते हुए एक वीभत्स शब्द गढ़ा था ‘भगवा आतंकवाद’| राहुल गांधी ने स्वयं कहा था कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ से देश को सिमी से ज्यादा खतरा है। ऐसे में अब अंगुली कांग्रेस पर उठना लाज़िमी है कि क्या किसी साजिश के तहत हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए जानबूझकर उन्हें इस केस में फंसाया गया? यह शक इसलिए भी पुख्ता होता है क्योंकि पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आरवीएस मणि ने खुद यह बात मानी कि इस केस के सारे सबूत मनगढ़ंत थे और कांग्रेस ने भ्रम फैलाकर लोगों की छवि धूमिल की। वोटों के लिए मंदिर-मठ के चक्कर लगा रहे राहुल गांधी को सामने आकर अपनी पार्टी का पक्ष इस मुद्दे पर रखना चाहिए।

हजारों आतंकवादी एक ‘वर्ग विशेष’ के पूरी दुनिया में कहर ढा रहे हैं, लेकिन हम उसके बाद भी बड़प्पन के साथ कहते हैं कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता, लेकिन कुछ फर्जी मुकदमे दायर कर, मनगढ़ंत कहानी बनाकर यदि कोई उसे ‘भगवा आतंकवाद’ का नाम देता है तो यह कितनी बेहूदा और शर्मनाक बात है। ऐसी बातें करने वाले नेताओं को अब इस फैसले के बाद शर्म से पानी हो जाना चाहिए, लेकिन दोगलापन यह है कि वे यह कह रहे हैं कि जांच एजेंसियां सरकार की कठपुतली की तरह काम कर रही है। “चोरी, ऊपर से सीनाजोरी” शायद यही कहलाती है।

अब गंभीर सवाल जो देश के सामने आ खड़े हुए हैं, वे ये हैं कि जब सभी आरोपी बेकसूर सिद्ध हो चुके हैं तो इन बेगुनाहों को इतने सालों तक यातना देने की साजिश करने वालों को सजा क्यों न दी जाए? क्यों न साजिशकर्ताओं की पहचान करके उनके खिलाफ मुकदमे चलाए जाएं? यदि दोषियों पर सख्ती नहीं की गई और ऐसे ही चलता रहा तो कानून की आड़ में फिर कोई बेगुनाह गंदी सियासत का शिकार होकर जेल में सड़ेगा। आखिर कब तक यह चलता रहेगा?

इतना होने के बाद भी मैं उन सभी को खुशनसीब कहूंगा कि आखिर 11 साल बाद ही सही उन्हें इंसाफ मिला तो। ऐसे भी हजारों केस पड़े हैं न्यायालयों में, जहां अभियुक्तों की जिंदगी में न्याय का सूरज निकलने से पहले जिंदगी का दिन ही अस्त हो जाता है। अब वक्त आ गया है कि सलमान खान को 2 दिन में जमानत देने वाले हमारे सिस्टम को अपने गिरेबां में एक बार झांक ही लेना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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