भाजपा के लिए कांटों भरी राह…

0

राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला को तलाक उपरांत जीवनयापन के लिए मिलने वाली रकम को लेकर दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर रख दिया था। भारतीय राजनीति में ‘शाहबानो प्रकरण’ के नाम से विख्यात इस घटना को कांग्रेस द्वारा किए गए मुस्लिम तुष्टिकरण के सबसे बड़े उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। कट्टरपंथी मुस्लिमों को खुश करने के लिए राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, जिसके लिए आज भी उनकी आलोचना की जाती है।

पिछले दो दिनों से फेसबुक और ट्विटर पर भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के प्रति लोगों का गुस्सा उबल रहा है। सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर सुषमा स्वराज को लेकर जनता में भारी नाराज़गी छाई है। तन्वी सेठ उर्फ सादिया सिद्दीकी उर्फ सादिया अनस के मामले में आनन-फानन में उन्हें पासपोर्ट जारी करने और विकास मिश्रा नाम के अधिकारी के तबादले से गुस्साए लोगों ने सुषमा को हर मुमकिन तरीके से लानतें भेजीं। फेसबुक पर उनके पेज की रेटिंग गिराने के सामूहिक अभियान चलाए गए और वे सफल भी रहे। उनके पेज की रेटिंग 4.7 से घटकर 1.5 तक आ गई।

भाजपा की आईटी सेल इस मामले में जब सक्रिय हुई, तब जाकर उनके फेसबुक पेज से रिव्यू और रेटिंग का ऑप्शन हटा लिया गया, लेकिन उसके बाद भी लोगों की गुस्से से भरी टिप्पणियों ने फेसबुक और ट्विटर पर सुषमा स्वराज को जमकर ट्रोल किया। सोशल मीडिया पर अत्यंत सक्रिय एक मंत्रीजी ने कल स्वदेश लौटते ही ऐसे प्रतिक्रिया दी, जैसे इस मसले की उन्हें कुछ खबर ही नहीं हो। मैडम ने कहा, आज भारत लौटने पर कई ट्वीट्स मुझे दिखे, लेकिन मुझे पता नहीं मेरी अनुपस्थिति में देश में क्या हुआ।

सुषमा स्वराज जैसी काबिल और निडर मंत्री से उम्मीद थी कि वे इस मामले में अपनी गलती मानते हुए सादिया का पासपोर्ट निरस्त करेंगी और विकास मिश्रा के तबादले को रुकवाएंगी या फिर इस मामले में कम से कम किसी जांच की बात वो कहती, लेकिन जिस भोलेपन से उन्होंने इस मामले पर प्रतिक्रिया दी, उससे एक बार फिर यह साफ हो गया कि नेता देश की जनता को आज भी मूर्ख ही समझते हैं। विदेशमंत्री को उनके विदेश प्रवास के दौरान देश में क्या हुआ, यह नहीं पता| यह बात ही कितनी हास्यास्पद और बेहूदी बात है।

शाहबानो प्रकरण पर जो गलती राजीव गांधी ने की थी, सादिया सिद्दीकी मामले में वही गलती वर्तमान सरकार कर रही है। नियमों को ताक पर रखकर और मीडिया के दबाव में आकर किसी को तत्काल पासपोर्ट जारी करना तुष्टिकरण की राजनीति का बेहतरीन नमूना है। खुद को राष्ट्रवादी राजनीतिक दल घोषित करने वालों को इस मुद्दे पर जवाब देते नहीं बन रहा है। जनता सवाल पूछ रही है कि जब नियम-कायदे ताक पर रखकर किसी का पासपोर्ट जारी किया जा सकता है तो फिर राम मंदिर बनाने और धारा 370 हटाने के लिए संविधान की दुहाई क्यों दी जा रही है?

आप मेहबूबा के साथ सरकार बनाएं तो भी देशभक्ति और गठबंधन तोड़े तो भी देशभक्ति यानी क्या आपने मान लिया है कि जनता को जैसे चाहे हांक सकते हैं? सुषमा स्वराज जैसी वरिष्ठ नेता भी समझ रही हैं कि गलती उनसे हो चुकी है। गांव के कच्चे घरों में जब बच्चे कहीं गंदा कर देते हैं तो उस पर घर के सयाने मिट्टी डाल देते हैं, उसे लीपते नहीं हैं। भाजपा की सरकार यही गलती कर रही है। सुषमा स्वराज अपनी गलती स्वीकार करके और माफी मांगकर इस मुद्दे को खत्म कर सकती है, लेकिन अहंकारी सत्ता आखिर बेचारी जनता से माफी क्यों मांगे? सत्ता का यही अहंकार भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। उनका कोर वोटर भी ऐसी आत्ममुग्धता को नकारात्मक रूप में ले रहा है। 2019 की राह भाजपा के लिए कांटों भरी दिखाई दे रही है।

-सचिन पौराणिक

Share.