आम जनता से दूरी का नतीजा

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आपसे उम्मीद थी कि आप राम मन्दिर बनाएंगे, लेकिन आपने सिर्फ बहाने बनाए। आपसे उम्मीद थी कि आपके आने से महंगाई पर लगाम लगेगी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं हुआ। आपसे उम्मीद थी जनसंख्या नियंत्रण कानून लाएंगे, लेकिन वह भी आप नहीं कर सके। धारा 370 और समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर आपके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला। पाकिस्तान से एक के बदले दस सिर भी आप नहीं ला पाए। 15 लाख सबके खाते में आए, यह चुनावी जुमला था। काला धन विदेश से कितना आया, इस पर कोई बात नहीं। और इतना होते हुए भी जनता जब आपसे गुस्सा हुई तो आपने इसे गुस्सा मानने से ही इनकार कर दिया। आपने मतदाता को अपनी जागीर समझा और वैसा ही व्यवहार किया।

इतना होने के बाद आखिर जनता करती भी क्या? जनता के ग़ुस्से को न समझ पाने और उनकी भावनाओं की कद्र न करने पर क्या होता है, यह आज पांच राज्यों के नतीज़ों को देखकर पता लग रहा है। यहां भाजपा नेताओं का अति आत्मविश्वास और अहंकारी रवैया जनता को बिल्कुल भी रास नहीं आया है। हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को जोर का झटका लगा है। एग्जिट पोल से भी खराब हालात हक़ीक़त में सरकार के लिए बनते नज़र आ रहे हैं। ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के मिशन को लेकर चल रही भाजपा के लिए ये नतीजे किसी दुःस्वप्न से कम नहीं हैं।

चैनलों पर भाजपा प्रवक्ताओं के चेहरे उतरे हैं। आलाकमान परिणाम से हैरान हैं, लेकिन ज़मीनी कार्यकर्ताओं के लिए यह चौंकने की बात नहीं है। धरातल पर सभी यह जान रहे थे कि भाजपा की ज़मीन खिसक रही है। रुठे मतदाताओं को भाजपा के छुटभैये नेताओं के रवैये ने और भड़काया। जनता की बात सुनने के बजाय हर बात पर इनके हवाई दावे होते थे। ऊपर से इनका अहंकारी रवैया भी जनता को बहुत खलता था। संघ के प्रचारक और कार्यकर्ता अपनी लाख कोशिशों के बाद भी पार्टी की डूबती नैया को नहीं बचा सके क्योंकि इनकी खुद की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ चुकी है। अपनी खुद की सरकार रहते भी राम मन्दिर सहित अन्य मुद्दों पर जिस लाचारी का प्रदर्शन संघ ने किया है, उससे जनता को इनकी किसी बात पर अब विश्वास नहीं रहा।

संघ यह अब भी नहीं समझ रहा है कि भाजपा अपनी जगह है, लेकिन संघ को लेकर भी जनता के मन में सवालों की एक लंबी लड़ी बन गई है। संघ की छवि भी अब सेवा नहीं बल्कि राजनीतिक संगठन के रूप में बनती जा रही है। रही सही कसर केंद्रीय नेतृत्व ने संवैधानिक संस्थाओं में छेड़छाड़ करके पूरी कर दी। सुप्रीम कोर्ट हो, सीबीआई हो चाहे आरबीआई हो, हर संस्था के सरकार से मतभेद इसी सरकार में खुलकर सामने आए हैं।

आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल का कल आया इस्तीफा भी इन्हीं विवादों से जोड़कर देखा जा सकता है। धरातल पर रहने वालों को इन परिणामों ने बिल्कुल नहीं चौंकाया, लेकिन हवाई नेताओं को ज़रूर जोर का झटका लगा है। आम जनता से कट जाने पर क्या होता है, यह इन नतीजों ने दिखा दिया है। अब वक्त भाजपा के लिए जागने का है क्योंकि यदि अब भी नहीं जागे तो ऐसा ही उलटफेर 2019 में भी देखा जा सकता है।

-सचिन पौराणिक

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