राजनीति में उबाल की संभावना

0

एक बार किसी मशहूर हास्य कवि (नाम भूल गया) ने एक किस्सा सुनाया था। एक बेटा अपने पिताजी से कहता है कि मुझे राजनीति सिखाओ। पिता कहते  हैं ठीक है, लेकिन पहले तू छत पर चढ़ जा। बेटा जल्दी से भागकर छत पर चला जाता है। पिता कहते हैं, बेटा ! अब तू किनारे पर आकर नीचे कूद जा। बेटा थोड़ा डरा, लेकिन पिताजी ने हिम्मत दी कि मैं तुझे संभाल लूंगा, तू कूद जा। बेटा राजनीति सीखने की गरज़ से छत से कूद पड़ा और उसकी कई हड्डियां टूट गईं। अस्पताल में प्लास्टर चढ़वाते हुए बेटे ने दुखी होकर पिता से कहा- “मैंने आपसे राजनीति सिखाने के लिए कहा था और आपने मेंरे हाथ-पैर तुड़वा दिए।” पिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- “बेटा! राजनीति का पहला सबक यही है कि अपने बाप की बात पर भी कभी भरोसा मत करना।”

बाप-बेटों के बीच परस्पर विचारों का कलह अपरिहार्य है। दो लोगों के सोचने का ढंग कभी एक-सा नहीं हो सकता है। विशेषकर पिता-पुत्र (पुत्री) के रिश्ते में तमाम बिंदुओं पर असहमति बिल्कुल साधारण और स्वाभाविक घटना है। बाप-बेटों के बीच थोड़ी-बहुत नोकझोंक हमेंशा चलती ही रहती है और यही इस रिश्ते की खूबी है। कोई बेटा कभी बाप की सभी बातों से सहमत नहीं हो सकता और बाप को भी अपने बेटे नालायक और नादान ही लगते हैं। निजी जीवन में यह एक सामान्य बात है, लेकिन राजनीति में ये बातें निजी जीवन से निकलकर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन जाती हैं।

राजनीति की हालत वास्तव में आज ऐसी ही हो गई है, जहां रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं रह गई है। उत्तरप्रदेश की सत्ता जाते ही मुलायमसिंह और उनके बेटे अखिलेश के बीच के मतभेद खुलकर सामने आ गए थे। पूरा यादव कुनबा ही सत्ता जाते ही फूंस की झाड़ू की तरह बिखरने लगा था। इसके अलावा भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा और उनके बेटे के मतभेद भी कई दफा उजागर हो चुके हैं। देश-दुनिया में अपनी ही ‘मोदी सरकार’ के खिलाफ माहौल बनाने वाले यशवंत सिन्हा अपने खुद के बेटे को यह बात नहीं समझा पा रहे हैं और उनके बेटे इसी सरकार में मंत्री बने बैठे हैं।

ताज़ा मामला पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के कद्दावर नेता रह चुके प्रणब मुखर्जी का सामने आया है, जब उनकी बेटी शर्मिष्ठा ने ही उनके नागपुर जाकर संघ के कार्यक्रम में शामिल होने पर सवाल उठा दिए हैं। गौरतलब है कि प्रणब मुखर्जी ने जब से संघ के कार्यक्रम में शामिल होने पर सहमति दी है, कांग्रेस नेता असहज महसूस करने लगे हैं। कांग्रेस के 30 से ज्यादा बड़े नेताओं ने चिट्ठी लिखकर प्रणब दा से नागपुर न जाने की गुहार लगाई थी, लेकिन इन सबके बावजूद वे कल शाम को ही नागपुर पहुंच गए।

प्रणब दा ने अपने राजनीतिक जीवन में जिस ऊंचाई को छुआ है, उसके बाद उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा शेष नहीं है, लेकिन शर्मिष्ठा का करियर अभी शुरू ही हुआ है और अपने पिता के विरोधी विचारधारा के किसी कार्यक्रम में शामिल होने से उन्हें भी असहज हालातों का सामना करना पड़ रहा है। शर्मिष्ठा अपने बारे में भाजपा से टिकट मिलने की अफवाहों से भी परेशान दिखाई दे रही हैं। वैसे गौर किया जाए तो शर्मिष्ठा भी हर साधारण बेटे-बेटी की ही तरह अपने पिता के सिद्धांतों और समीकरणों से इत्तेफाक नहीं रखती और उधर प्रणब दा सोच रहे होंगे कि बेटी अभी नादान है। राजनीतिक जीवन के इस द्वंद्व के बीच सबकी निगाहें आज टिकी हैं प्रणब दा के उद्बोधन पर, जिसके बाद देश की राजनीति में उबाल आने की पुरजोर संभावना है।

-सचिन पौराणिक

Share.