Talented View : उन्नाव रेप मामले में विधायक का वार, पीड़िता लाचार

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पुराने ज़माने में एक कहावत चलती थी- “जिसकी लाठी उसकी भैंस” इसका मतलब था कि जो ताकतवर है वही सही होता है, उसी की जीत होती है। लड़ाई का फैसला सही-गलत से इतर सिर्फ इस पर निर्भर करता था कि जिसके पास बल है वही सही है। ये सब तब चलता था जब कोई संविधान-कानून नही हुआ करते थे, लेकिन आज़ादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी हालातों में कुछ ज्यादा बदलाव नही हुआ है। ऐसा इसलिए महसूस हो रहा है कि उन्नाव गैंग रेप केस में हो रहे घटनाक्रम ने देश को हिलाकर रख दिया है। जिस तरह पीड़िता को मारने की कोशिशें की जा रही है उससे हर कोई हैरान है।

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अपनी किस्मत से लड़ाई लड़ रही पहले से दुखी रेप पीड़िता अब एक-एक करके अपने रिश्तेदारों को भी खोती चली जा रही है। अपनी आबरू लूटने वाले को सज़ा दिलाना तो दूर, उसे अब खुद के वजूद को जिंदा रखने के लिये भी संघर्ष करना पड़ रहा है। लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही लड़की को कहीं से कोई उम्मीद की किरण दिखाई नही देती है। ये सब तब हो रहा है जब हर हाथ मे मोबाइल फोन है और सोशल मीडिया पर पीड़िता का समर्थन किया जा रहा है। हम सबकी संवेदनाएं भी पीड़िता के साथ है, लेकिन उसके बाद भी उसके साथ हो रही ज्यादतियां जारी है। समझ नही आता कि इतने कानून, पुलिस, प्रशासन और जनसमर्थन के बाद भी हम इतने लाचार क्यों रह जातें है?

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बड़े-बड़े पत्रकार, फ़िल्मी सितारे और बुद्धिजीवी पीड़िता के समर्थन में खड़े है, लेकिन फिर भी न जाने क्यों उसे न्याय नही मिल रहा? एक ट्रक, पीड़िता की कार को टक्कर मारकर जान से मारने की कोशिश करता है। हादसा इतना जबरदस्त होता है कि पीड़िता की मौसी और एक अन्य रिश्तेदार मौके पर ही दम तोड़ देते हैं। पीड़िता और वकील गंभीर रूप से घायल है।

पीड़िता की कई पसलियां टूटी हैं, जांघ की हड्डी में फ्रेक्चर है और पेट मे भी अंदरूनी चोटें आयी है। हादसे के वक्त कोई सुरक्षाकर्मी भी उनके साथ नही था। अगर ये सिर्फ संयोग है तो सवाल है कि ऐसे जबरदस्त संयोग सिर्फ भारत मे ही क्यों होते हैं? और अगर ये साजिश है, जैसा कि शक है, तो ये सवालिया निशान है हमारी न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक मुस्तैदी पर। एक तरफ भाजपा विधायक है जिनके पास धनबल, बाहुबल भरपूर है, जो हर परिस्थिति से निपटने में सक्षम है।

दूसरी तरफ एक अबला, कमजोर लड़की है, जिसके पास ऐसा कुछ भी नही है जिससे वो विधायक को चुनौती दे सके। वो बेचारी हमारी न्याय व्यवस्था पर भरोसा करके इस लड़ाई में कूद गयी, लेकिन अब वो पछता रही होगी। जिस देश में सालों लग जाते हैं, ये पता करने में की हिरण को सलमान ने मारा था या नही,वहां हमारा सिस्टम उसे भला कैसे सुरक्षा दे सकता है?

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ऐसी घटनाएं देखकर कभी-कभी लगने लगता है कि इस देश में लड़की होना ही गुनाह तो नही है? विधायक जेल से भी वो सबकुछ कर रहा है, जो करना चाहता है जबकि पीड़िता आज़ाद होकर भी लाचार है। आज भी देश के हालात लगता है ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसे ही बने हुए है। सरकारें खामोश है, कानून केंचुए की तरह ‘रीढ़विहीन’ है, हम सोशल मीडिया पर कलम घिसकर अपने कर्तव्यों की ‘इतिश्री’ समझ रहे हैं। इस बीच उन्नाव केस जैसी बेटियों को बचाने के लिए कौन आगे आयेगा ये सवाल जस का तस बना हुआ है।

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