पत्रकारिता के गिरते मूल्य !

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कल टीवी पर एक लोकप्रिय समाचार चैनल देख रहा था, जिसकी टीआरपी सबसे ज्यादा है (यह दावा भी उसी चैनल का है)। एक खबर थी कि कुएं में डूबकर एक बच्चा मर गया। न्यूज़ एंकर की इस खबर पर विशेष टिप्पणी यह थी कि- “इस मामले में गलती गांववालों की है, उन्होंने कुएं को ढंककर क्यों नहीं रखा?” यह सुनते ही मेरी हंसी फूट पड़ी। वातानुकूलित स्टूडियो में बैठकर पत्रकारिता करने वाली एंकर से यही उम्मीद थी। कल को कोई बच्चा नदी में डूबकर मरेगा तो शायद ये मोहतरमा कहेंगी कि नदियों को ढंककर क्यों नहीं रखा गया? मैं समझ गया कि मैडम का वास्ता कभी गांव, खेत, कुओं और नदी-नालों से रहा ही नहीं होगा, नहीं तो ऐसी बेवकूफी भरी टिप्पणी वे हरगिज़ न करती।

ऐसा ही एक और वीडियो सोशल मीडिया में चल रहा है, जिसमें एक मशहूर टीवी एंकर, जो अपने आप को सबसे निष्पक्ष और धर्मनिरपेक्ष पत्रकार होने का दावा भी करते हैं, वे धान के खेत में खड़े होकर रिपोर्टिंग करते हुए धान का मतलब दर्शकों को गेहूं समझा रहे थे। अब जो पत्रकार चावल और गेहूं में अंतर न समझे, उनकी ज़मीनी रिपोर्टिंग पर कोई कैसे यकीन करे? ऐसे ही एक बार खेतों में नीलगाय के फसल बर्बाद करने पर जब चर्चा चल रही थी, तब भी एक एंकर ने किसान नेता से ऐसी ही बचकानी बात कही थी। नीलगाय के आतंक से बचने के लिए एंकर का सवाल था कि किसान खेत के चारों तरफ बाड़ या फेंसिंग क्यों नहीं करवा लेते? भारत के खेतों में कुछ समय भी यदि एंकर महोदय ने गुजारा होता तो निश्चित ही ऐसी नासमझी भरी टिप्पणी नहीं करते।

दोष सिर्फ पत्रकारों का भी नहीं है| आजकल बहस में ऐसे-ऐसे नमूने बुलाए जाने लगे हैं, जिससे दर्शकों का संपूर्ण मनोरंजन न्यूज़ चैनलों पर ही हो जाता है। टीवी पर अनेक चैनलों पर आने वाली बहस के लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है की दर्शकों को एक्शन, कॉमेडी और हंगामा सब एक ही जगह देखने को मिल रहा है। धर्म पर कभी बहस होती है तो कई कथित संत ऐसी वेशभूषा में नज़र आते है जो संत कम जोकर अधिक लगते है। वैसे ही मुस्लिम समाज से जुड़े विषयों पर चर्चा में हिस्सा लेने वाले मौलवी-मौलाना अपनी जाहिल बातों, तर्कों और हरकतों से पूरी कौम का सिर शर्म से झुका देते हैं।

टीवी बहस आज से कुछ साल पहले तक भी बड़ी संयमित और मर्यादित होती थी। प्रवक्ता अपना पक्ष साफगोई से रखते थे और एंकर भी गंभीरता से बहस को आगे बढ़ाते थे, कहीं कोई नाटकीयता और ओछापन नहीं था, लेकिन बीते कुछ सालों में टीवी बहस में गाली-गलौज, धमकी से मार-कुटाई तक आ पहुंची है। स्वामी ओम औऱ मौलाना कासमी जैसे कथित धर्मगुरु लाइव शो में महिलाओं से हाथापाई करते दिख चुके हैं तो भाषाई मर्यादा हर चैनल पर इतनी बार तार-तार हो चुकी है, जिसकी कोई गिनती ही नहीं।

अभी ताज़ा मामले में कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी एक बहस के दौरान एंकर को अपशब्द कहते दिखाई दिए। एंकर बेचारा यह सुनकर सकपका गया, लेकिन त्यागी ने उसके बाद भी कई बार इन्हीं शब्दों को दोहराया। हालांकि अगले दिन बहस में फिर से शामिल होकर राजीव त्यागी ने भावनात्मक ड्रामे के साथ अपनी मां की कही बातों का हवाला देकर अपने शब्दों पर खेद जता दिया।

हालात ऐसे हो चले हैं कि आजकल दर्शक भी यही सोचकर टीवी बहस देखने बैठते हैं कि चलो कुछ हंगामा और तमाशा देखने को मिलेगा। टीवी बहस के शो अब ‘संवाद’ की जगह ‘विवाद’ पर केंद्रित हो चुके हैं। प्रतियोगिता का ज़माना है और सभी एंकरों को अपने शो की टीआरपी बढ़ानी होती है इसलिए यदि किसी शो में विवाद होता है तो इसका फायदा पूरे चैनल को मिलता है। फिर दूसरे एंकर और चैनल भी प्रतिद्वंद्विता के लिए और उत्तेजनापूर्ण और गर्मागर्म बहस कराते हैं, जिससे टीवी पर अभद्र भाषा और हिंसक घटनाओं में वृद्धि होती जा रही है। ऐसे ही बहस चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब बहस के शो में हिस्सा लेने वाले हर पेनलिस्ट के पीछे एक सुरक्षाकर्मी तैनात करना पड़ेगा, जो वक्त आने पर स्टूडियो में हाथापाई होने से रोक सके।

-सचिन पौराणिक

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