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Talented View : विश्व फोटोग्राफी दिवस के मायने

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आज सुबह से सोशल मीडिया पर ढेरों तस्वीरें देखने को मिल रही थी। मैं सोच में पड़ रहा था कि ये आखिर हुआ क्या? हर कोई अपने मोबाइल फोन से ली हुई कुछ तस्वीरें शेयर कर रहा था। फिर थोड़ा गूगल किया तो पता चला कि आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है। और दिन कोई भी हो उसे मना लेना हम भारतीयों का शगल बन चुका है। फोटोग्राफी दिवस की अगर शौचालय दिवस भी होता तो भी हमारे कुछ बहादुर साथी ‘लोटे’ के साथ तस्वीर सोशल मीडिया पर डाल रहे होते।

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भले आपको ये मज़ाक लगे, लेकिन ‘विश्व शौचालय दिवस’  भी एक बला है जो 19 नवंबर को दुनियाभर में मनाया जाता है। इसी दिवस को देखकर भारत ने ‘योगदिवस’ की प्रेरणा ली थी। क्योंकि अगर शौचालय तक के नाम पर एक दिन हो सकता है, तो योग के नाम पर भी होना ही चाहिए। खैर, ये इस तरह के दिवस मनाए जाने का तुक मुझे समझ नही आता। एक दिन किसी चीज़ को याद कर लेने से, तस्वीर खींचा लेने से या मैसेज कर देने से शायद ही परिस्थितियों में कुछ तब्दीली आये।

अब साल में एक बार फादर्स डे या मदर्स डे मनाने से भला क्या होगा? इसी तरह टीचर्स डे है। क्या गुरुजन सिर्फ एक दिन याद करने के लिए होते है? इनसे आगे रोज़ डे, प्रपोस डे, किस डे, हग डे जैसे दिनों पर तो तत्काल प्रभाव से पाबंदी लगा देनी चाहिये। ये फिजूल के दिवस न सिर्फ युवाओं को गुमराह करते हैं, बल्कि इससे उनके बौद्धिक स्तर में भी गिरावट देखने को मिलती है। इसके अलावा वेलेंटाइन डे के नाम पर जो नौटंकी फैलाई जाती है उसे देखकर कलेजा भुन जाता है।

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ये सब दिवस उन देशों, उन संस्कृतियों में कारगर होते हैं, जिनके यहां त्योहारों की कमी होती है, लेकिन हमारे देश में त्योहारों की बहुलता है। ऐसा कोइ सप्ताह या महीना नही बीतता है जब हमारे यहां कोई व्रत-त्योहार न आये। अभी कल ही यहां ‘तीज़’ मनाई गयी। इसे कजली तीज़, सातुड़ी तीज़ या सत्तू की तीज़ भी कहा जाता है। महिलाओं ने इस त्योहार पर दिन में व्रत रखकर रात को पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने कल इस मौके पर इतनी तस्वीरें ली कि उन्हें ‘विश्व फोटोग्राफी डे’ पर अलग से तस्वीरों की कोई जरूरत ही नही पड़ी।

भारत में आज की युवा पीढ़ी हमारे पारंपरिक त्योहारों से दूर होती जा रही है और इन ढकोसलों पर ज्यादा ध्यान देने लगी है। ये स्थिति चिंताजनक है। हमारे पास होली जैसा रंगीन, दीवाली जैसा प्रकाशमय, रक्षाबंधन जैसा पवित्र और दशहरे जैसे महिमावान त्योहार है। इसके अलावा हर राज्य के अपने त्योहार है। इनके अलावा गणेश उत्सव, नवरात्रि जैसे लंबे चलने वाले त्योहार भी हैं। जन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि जैसे उत्सव भी हैं, तो पूर्णिमा, अमावस, तीज़, चतुर्थी जैसे अनगिनत व्रतोत्सव है।

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ऐसी गौरवशाली विरासत को छोड़कर अगर हमारी युवा पीढ़ी व्यर्थ के ‘दिवस’ मनाना शुरू कर दे तो चिंता लाज़िमी है। अगर ये ‘डे’ मनाने भी है तो इसके लिए हमारे पारम्परिक त्योहारों को भूलने की बिल्कुल जरूरत नही है। ये व्रत, उत्सव हमारी जड़े हैं। इनसे ही अगर हम कट जाएंगे, तो ऊंचाईयों तक पहुंचना नामुमकिन हो जायेगा। भारतीयता बसती ही त्योहारों में है इसलिए हम असली भारतीय तभी कहलायेंगे जब हम अपने त्योहार हर्षोल्लास और गौरव के साथ मनाएंगे।

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