Talented View : नशा छोड़ें और एक अहसान खुद पर करें

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टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन बड़े रोचक होते हैं। उपभोक्ता के दिलो-दिमाग पर कैसे असर डालना है, यह विज्ञापन वालों से बेहतर कोई नहीं जानता। तम्बाकू जैसी चीज़ के विज्ञापन भी इस अंदाज़ में बनाए जाते हैं कि देखने वाला दंग रह जाए। गुटखा बोलना अच्छा नहीं लगता इसलिए विज्ञापन “पान मसाला” के नाम से बनाए जाते हैं। यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे शराब का विज्ञापन करना प्रतिबंधित है इसलिए शराब कंपनियां उसी ब्रांड के ‘सोडा’ का विज्ञापन करती हैं।

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धूम्रपान और तम्बाकू के विज्ञापन के पात्रों को इतना महिमामंडित किया जाता है मानो गुटखा खाए बिना कोई जीवन ही नहीं है। इन विज्ञापनों को देखकर लगता है कि जीवन में सफलता पाना हो, ऊंचाइयों को छूना हो, सभी को इम्प्रेस करना हो तो फलाना ब्रांड का “पान मसाला” ही एकमात्र विकल्प है।

एक ब्रांड अपने गुटखे में असली केसर होने का दावा करता है, लेकिन नीचे छोटे अक्षरों में लिखा होता है कि इसके सेवन से कैंसर होता है। हालांकि इस गुटखे की कीमत असली केसर के बराबर ही होती है, लेकिन ऐसा नहीं है कि उपभोक्ता यह बात समझ नहीं पाते हैं, लेकिन ये विज्ञापन वाकई में इतने आकर्षक होते हैं कि अगला हकीकत को देखना ही नहीं चाहता है। ये विज्ञापन जितने ग्लैमर भरे होते हैं हकीकत उतनी ही भयंकर होती है। मुंह का कैंसर, गले का कैंसर, पेट का कैंसर, आंतों के कैंसर के अलावा सैकड़ों अन्य बीमारियां तम्बाकू उत्पादों द्वारा जन्म लेती है। इन बीमारियों को पनपने और विकराल रूप लेने में कुछ साल लगते हैं।

सेहत पर तत्काल प्रभाव ये उत्पाद नहीं दिखाते इसलिए लोग भी इनका उपयोग करने से बाज़ नहीं आते हैं। सरकारों को रेवेन्यू से आगे कुछ दिखाई नहीं देता इसलिए आज हर गली-नुक्कड़, चौराहों पर यह ज़हर निर्बाध रूप से बेचा जा रहा है। इन दुकानों पर कुछ लड़के स्थायी रूप से जमे रहते है।  नौकरीपेशा से लेकर निपट बेरोज़गार सभी मुंह में गुटखा दबाये जहां-तहां देश की धरती को लाल करने में लगे हुए हैं। कुछ लोग सिगरेट, तम्बाकू के इतने शिकंजे में फंस जाते हैं कि उधार लेकर भी इन्हें यह सब ख़रीदना पड़ता है।

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यह भी एक विचित्र सत्य है कि पैसे की कमी के कारण पढ़ाई छोड़ने वाले हज़ारों मिल जाएंगे, लेकिन पैसे की कमी से सिगरेट और तम्बाकू छोड़ने वाला एक भी नहीं मिलेगा। मुंह में गुटखा दबाए बैठे ये लोग शायद अपने आप को बाकियों से बेहतर मानते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। सच्चाई यह है कि ये लोग इतने मूर्ख हैं कि दिखावे में आकर ये खुद अपना और परिवार का जीवन तबाह करने में लगे हुए हैं।

नशे का ज़िक्र चला है तो एक रोचक बात आपको बताता हूं। हिमाचल प्रदेश में एक गांव है ‘मलाणा’| यह गांव आज भी भारत के संविधान को नहीं मानता। यहां के लोग जमलू ऋषि के वंशज माने जाते हैं और कुछ अपने आप को सिकंदर की सेना का सिपाही समझते हैं। इन लोगों के गांव में बाहर से आया कोई शख्स किसी चीज़ को नहीं छू सकता। ऐसा करने पर ये लोग 1000 से लेकर 2000 रुपए तक जुर्माना वसूलते हैं।

आजीविका के लिए ये लोग अफीम की खेती करते हैं और ऐसा बताते हैं कि इस गांव की अफीम दुनिया की श्रेष्ठतम अफीम है। इस दुर्लभ अफीम की तलाश में पूरी दुनिया के अफीमची यहां पहुंचते हैं। इस गांव के लोग भी अपने आप को बाकियों से ऊंचा समझते हैं। इस गांव की भाषा, रीति-रिवाज और रहन-सहन भी अलग है। इस गांव के बारे में बताने का आशय सिर्फ इतना है कि आपको इल्म हो कि सरकारें नशे को लेकर वाकई में कितनी गंभीर हैं।

आंकड़ों की बात करें तो भारत में रोज़ ही करीब 2739  लोग नशे के कारण होने वाली बीमारियों से मारे जाते हैं। मध्यप्रदेश की बात करें तो यह आंकड़ा 348  मौतें रोज़ है। निकोटिन का सेवन हमारी युवा पीढ़ी निसंकोच कर रही है और इससे भारत का भविष्य ही दांव पर लग गया है। मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल कल से शुरू हो गया है। राजनीतिक मुद्दों से इतर देश के युवा को नशे से मुक्त करने की न कोई मांग कहीं से उठ रही है और न ही सरकार इस बारे में सोच रही हैं।

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आज “विश्व तम्बाकू निषेध दिवस” के मौके पर हम युवाओं से अपील करते हैं कि नशा छोड़ें और एक अहसान खुद पर करें। विज्ञापनों के आकर्षण में बहकर आप स्वयं की जवानी ख़राब न करें। तम्बाकू खाने से कामयाबी नहीं मिलती, कामयाबी के लिए श्रम लगता है, आत्मानुशासन लगता है, एक बड़ी सोच लगती है। नशे को पीछे छोड़कर आएं, आगे बढ़ें, देश का, परिवार का नाम रोशन करें और एक उज्ज्वल भारत के निर्माण में अपना योगदान दें, यही आपसे आज हाथ जोड़कर निवेदन है।

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