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Talented View : भारी बारिश के बाद भी सूखा का संकट!

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इस बार मानसून लगभग पूरे देश पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहा है। देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश औसत से ज्यादा दर्ज हुई है। बारिश के साथ ही नदी-नालों में आया उफान अब तक थमा नही है। लौटता हुआ मानसून भी अपना जलवा दिखाने में कोई कसर नही छोड़ रहा है। पूर्वांचल और बिहार के कई गांव अब भी बारिश में डूबे हुए है। बिहार की राजधानी पटना के कई मोहल्लों में अब भी पानी भरा हुआ है।

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जलजमाव की इस स्थिति में हर आमोखास परेशान हो रहा है। लोग इस समस्या के लिए भी बाकी समस्याओं की ही तरह सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। सरकार की जिम्मेदारी है भी, लेकिन गलतीं की बात करें तो ये सिर्फ सरकार की नही हम सबकी है। हर गांव, शहर में बरसात के पानी की निकासी के कुछ प्राकृतिक रास्तें होते हैं। ये रास्ते रातोंरात नही बनते बल्कि दशकों के भौगोलिक बदलाव के बाद बनतें हैं। ऐसे ही तालाब, झीलों और नदियों में भी पानी को आवक के कई प्राकृतिक रास्ते होतें है। इन रास्तों से ही पानी बहकर तालाबों में आता है।

2 साल पहले शहर में एक तालाब में पर्याप्त बारिश के बाद भी पानी इकठ्ठा नही हुआ। पर्यावरण प्रेमियो ने जब इस विषय पर गौर किया तो पाया कि जिन छोटे-छोटे नालों से तालाब में पानी आता था उन पर कहीं अतिक्रमण कर पक्का निर्माण कर लिया गया है तो कई नालों को मुरम से पाट दिया है। केचमेंट इलाके में होने वाले इस बदलाव का भयावह असर पूरे क्षेत्र के भूजल स्तर पर पड़ता है। पर्यावरण प्रेमियों ने जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर आंदोलन चलाया और केचमेंट एरिया के सारे अतिक्रमण हटाये गए। इसके बाद नाले पुनः शुरू किये तब जाकर तालाब में पानी आना शुरू हुआ।

कहने का आशय स्पष्ट है कि दशकों के बनाये गए प्राकृतिक रास्तों को बाधित करने का कार्य कुछ घंटों में किया जा सकता है। पानी के बहाव को बाधित करने का ये कार्य हर गांव, शहर और महानगर में बड़े पैमाने पर हुआ है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का भी स्वाभाविक प्रभाव मौसम पर आया ही है। इन सब वजहों से हालात ऐसे हो गए है कि थोड़ी सी बारिश में ही जलजमाव की स्थिति बन जाती है। अगर बारिश लगातार हो तब तो हालात बाढ़ में तब्दील हो जाते हैं।

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इतनी अधिक बरसात और शहरों में जलजमाव के बावजूद आज भी कई कुए सूखे हैं, कई तालाब खाली है जबकि शहरों में पानी भरा हुआ है। इस परिस्थिति का दोषी सिर्फ सरकार को नही ठहराया जा सकता। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने में कोई पीछे नही है। नदी-नालों पर अतिक्रमण करके, केचमेंट एरिया को बाधित करके हम अपने विनाश की कहानी खुद लिखतें है और दोष सरकारों पर मढ़ते है। पटना में शहरी इलाके में पानी घुसा है तो इसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। नही तो कोसी नदी की बाढ़ हर साल ही बिहार के ग्रामीण अंचल को डुबो देती है और इसकी कहीं चर्चा तक नही होती।

जब तक केचमेंट एरिया और पानी की निकासी के मार्ग पर हम अतिक्रमण करते रहेंगे तब तक बाढ़ के ऐसे हालात हमसे काबू में नही आने वाले। बिहार का मुख्यमंत्री चाहे नीतीश हो चाहे गिरिराज सिंग हो, जीतनराम मांझी हो या लालू यादव, जब तक समस्या की वजह को हम समाप्त नही करेंगे तब तक बारिश का पानी हमारे घरों, शहरों में घुसता ही रहेगा। हम प्रकृति के प्रवाह में बाधक नही बनेंगे तो प्रकृति भी हमारी अविरलता में कभी दखल नही डालेगी।

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      – सचिन पौराणिक

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