पूर्ण बहुमत और 56 इंच की बेबस सरकार…

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2010 में कर्नाटक में भाजपा सत्ता में थी और तब राज्य से राज्यसभा की 4 सीटें खाली थी। 2 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी जबकि 1 पर कांग्रेस प्रत्याशी का चुना जाना तय था, लेकिन चौथी सीट पर पेंच फंसा हुआ था। इस चौथी सीट पर दांव लगाने के लिए विजय माल्या मैदान में उतरे और उन्हें जेडीएस का समर्थन भी मिल गया। इधर, भाजपा विधायकों ने तय किया कि कांग्रेस प्रत्याशी को हराना है इसलिए उन्होंने भी राज्यसभा की चौथी सीट के लिए विजय माल्या को वोट दे दिए। यह थी कहानी विजय माल्या के राज्यसभा पहुंचने के पीछे की।

संसद के गलियारों में सांसदों की आपस में बातचीत होती रहती है। संसद जाते समय, बाहर निकलते समय, कैंटीन में तो कभी सेंट्रल हॉल में सभी पार्टी के सांसदों के बीच अनौपचारिक चर्चा चलती रहती है, लेकिन जैसे ही लंदन में बैठे विजय माल्या ने संसद में वित्तमंत्री अरुण जेटली से अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र किया, वैसे ही भारत की राजनीति में उथल-पुथल मच गई। कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया ने भी माल्या की बात पर मुहर लगाते हुए कहा कि उन्होंने दोनों को बात करते अपनी आंखों से देखा था। कांग्रेस माल्या के इस खुलासे के बाद से ही भाजपा पर हमलावर है और राहुल गांधी खुद जेटली पर निशाना लगा रहे हैं।

हालांकि सांसदों के बीच चर्चा आम है, लेकिन जब चर्चा एक आरोपी के साथ हो तो ऐसी बातों को छिपाना नहीं चाहिए। अरुण जेटली ने यह स्वीकार किया कि माल्या उनसे अनौपचारिक तौर पर मिला था और बैंकों का पैसा लौटाने की बात कर रहा था, लेकिन जेटली ने उनसे बैंकों से ही संपर्क करने की बात कही। भाजपा इस मुलाक़ात पर कांग्रेस के हमले को बचकाना साबित करना चाह रही है, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह एक सच्चाई है कि विजय माल्या उनके शासन में ही देश से फरार हुआ है। आज भाजपा ने ऐसा माहौल बना रखा है कि यदि उनसे विजय माल्या के भागने पर सवाल पूछोगे तो वह भोपाल गैस कांड के एंडरसन के भागने की बात करेंगे। पेट्रोल महंगा होने पर सवाल पूछोगे तो वे आलू और दाल सस्ते होने की बात करेंगे।

गिरते रुपए की बात पूछोगे तो वे कहेंगे अंतरराष्ट्रीय हालात पर हमारा कंट्रोल नहीं है। आतंकवाद पर सवाल पूछोगे तो वे सर्जिकल स्ट्राइक की बात करेंगे। घोटालेबाजों को जेल भेजने पर सवाल पूछोगे तो वे 60 साल के घोटाले गिना देंगे। विजय माल्या केस में भी कांग्रेस सरकारों की गलती रही है, लेकिन भाजपा के राज में माल्या देश से भाग गया, इस पर सरकार की भी जवाबदेही बनती है। सुब्रहमण्यम स्वामी खुद कह रहे है कि सरकार में किसी ने माल्या की मदद की है, तभी वह देश से इतनी आसानी से भाग सका। उनके खिलाफ जारी लुकआउट नोटिस को सरकार में शामिल किसी ने ‘हल्का’ कर दिया था। सरकार को यह समझना चाहिए कि विदेश भाग चुके आरोपियों को वापस लाने में संसाधन फूंकने से कई गुना बेहतर होता, उन्हें विदेश भागने से पहले ही रोक लेना।

किसी छोटे-मोटे केस में फंसने वाले आरोपियों के भी जब पुलिस पासपोर्ट जब्त कर लेती है तो माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी जैसे बड़े अपराधियों के पासपोर्ट जब्त क्यों नहीं किए गए? छोटे अपराधी जहां जमानत के पैसे न होने की वजह से जेल में बेवजह सड़ते रहते है जबकि माल्या जैसे बड़े अपराधी देश से बाहर भी मौज में रहते हैं और भारत का संविधान लाचारी से उन्हें देखता रहता है। 2014 के बाद जनता को उम्मीद जागी थी कि अब देश के दुश्मन जैसे दाऊद इब्राहिम भी भारत लाए जाएंगे और उन्हें अपने गुनाहों की सज़ा मिलेगी, लेकिन यहां तो उल्टे विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे अपराधी भी विदेश भाग चुके हैं। पूर्ण बहुमत और 56 इंच की सरकार भी इतनी बेबस हो जाएगी इसकी उम्मीद जनता को बिल्कुल नही थी।

-सचिन पौराणिक

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