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Talented View : कश्मीर और देश की शांति के लिए यह बहुत ज़रूरी

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कहते हैं आतंकवाद का कोई धर्म-मज़हब नहीं होता, लेकिन यह भी सच है कि आतंकी हमलों का साया अमरनाथ यात्रा पर ही होता है, हजयात्रियों पर नहीं। फिलहाल, जबरदस्त सुरक्षा इंतजामों के बीच अमरनाथ यात्रा चल रही है। यात्रा मार्ग के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल खड़े दिखाई दे रहे हैं। अमरनाथ यात्रा पर गए एक मित्र ने फोन पर बताया कि इस बार अब तक की सबसे बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था है।

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राज्य की पुलिस के साथ केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवान तीर्थयात्रियों की सुरक्षा में मुस्तैदी से लगे हैं। यात्रियों को मेडिकल सहायता भी ये जवान ही मुहैया करवा रहे हैं,  लेकिन ये सुरक्षा इंतजाम कुछ पाकिस्तानपरस्त नेताओं को भा नहीं रहे हैं। उन्हें बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है कि कैसे बिना खून बहाए यह यात्रा हो रही है इसलिए महबूबा मुफ़्ती जैसे नेता आम कश्मीरियों के नाम पर यात्रा की सुरक्षा को ही कोसने में लग गए हैं।

महबूबा का कहना है कि यह यात्रा सालों से होती आई है, लेकिन इन बार यात्रा के इंतजामों से कश्मीरियों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो रही है। उन्होंने राज्यपाल से मामले का संज्ञान लेने की अपील और हुर्रियत के एक धड़े से बातचीत की बात भी कही है, लेकिन महबूबा मुफ्ती जैसे नेता यह भूल जाते हैं कि यदि सुरक्षा इंतजाम न हो तो आतंकी निर्दोष यात्रियों के खून से होली खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इन सबके बीच असली सवाल है कि यदि अमरनाथ जाने वाले यात्री मुस्लिम होते, तब भी क्या आतंकवादी इन हमलों को अंजाम देते ? जवाब है- बिल्कुल नहीं। हम न जाने क्यों यह कहने में इतना सकुचाते हैं कि कश्मीर का आतंकवाद असल में “इस्लामिक जिहाद” है।

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इन आतंकवादियों का मकसद ही गैर-मुसलमानों का खून बहाना है। इसके लिए ये जिहादी अपने मौलाना-मौलवियो और धार्मिक साहित्य से प्रेरणा लेते हैं। कश्मीर में हज़ारों पंडितों का नरसंहार, अमरनाथ यात्रियों पर हमला, सुरक्षा बलों पर हमला, सैलानियों पर हमले और आतंकी वारदातों को अंजाम किस आधार पर दिया जाता है? सब कुछ जानकर, समझकर भी शुतुरमुर्ग की तरह बर्ताव करने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं है।

आज महबूबा यदि कह रही हैं कि यात्रा के लिए हाईवे बंद करने से कश्मीरियों को तकलीफ हो रही है तो इस बयान के मायने समझने की ज़रूरत है। यदि यात्रा के लिए हाईवे बन्द किया जाता है तो महबूबा जब मुख्यमंत्री थी, तब उनके काफ़िले के लिए रास्ता बंद नहीं किया जाता था क्या?  यदि रास्ता खोला जाए और कोई हादसा हो जाए तो क्या महबूबा इसकी जिम्मेदारी लेंगी? आम कश्मीरियों को समझना होगा कि महबूबा जैसे पाकिस्तान परस्त नेताओं को सिर्फ अपनी राजनीति से मतलब है। इन्हें फिक्र कश्मीरियों की नहीं है। इन्हें फिक्र अपने पाकिस्तानी आकाओं की हो रही है, जो घाटी में अशांति और खून-खराबा चाहते हैं, जो चाहते हैं कि कश्मीर का युवा मुख्यधारा में शामिल होकर तरक्की करने के बजाय जिंदगीभर लालचौक पर खड़ा सेना पर पत्थर ही फेंकता रहे।

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पुनः अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा हम सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि कश्मीरियों को सुरक्षा इंतजामों से कोई तकलीफ हो भी रही है तो अपने हिन्दू भाइयों की सुरक्षा के लिए उन्हें खुशी-खुशी यह तकलीफ उठानी चाहिए। गंगा-ज़मुनी तहज़ीब की जिम्मेदारी दोनों पक्षों पर बराबर है। यदि आम कश्मीरी भी आतंकवादियों की ही भाषा बोलेगा और यात्रियों का खून बहाने पर आमादा हो जाएगा तो आतंक के मजहब पर ये अपने आप में  एक “ठप्पा” होगा। महबूबा चाहे जितनी ही चिल्लाए, लेकिन केंद्र को बिना किसी दबाव में आए इन पाकिस्तानी सपोलों के फन को कुचल देना होगा। कश्मीर और देश की शांति के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

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