Talented View : उन्नाव के जले का घाव

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कल की सुबह जहाँ देश ने जश्न मनाया वहीं आज सुबह एक दुखद खबर आ गयी। उन्नाव की रेप (Unnao Gangrape) पीड़िता बेटी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी की लड़ाई हार गई। बेटी करती भी क्या, हैवानों ने उसे 90% तक जला दिया था। मौत के बाद अब उसका भाई कह रहा है बहन की शरीर मे जलाने लायक कुछ बचा नही है इसलिए उसे दफनाया जायेगा। उन्नाव की बेटी के लिए एक समाज के तौर पर हमें शर्म आना चाहिए।

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Unnao Gangrape

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कल हैदराबाद की घटना के बाद देश मे एक नई बहस छिड़ गई है। बहस ये की रेप के आरोपियों का हैदराबाद की तरह एनकाउंटर (Hyderabad encounter) करना चाहिए या फिर न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए दोषियों को सज़ा दिलानी चाहिए। एक सभ्य समाज के तौर पर सोचा जाए तो आरोपियों का एनकाउंटर सही नही माना जा सकता। देश मे कानून है, कोर्ट है और उसी के अनुसार सज़ा होना चाहिए। लेकिन ये परिस्थिति का सिर्फ एक सैद्धान्तिक पक्ष है। व्यवहारिक पक्ष दरअसल बहुत खौफनाक है।

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व्यवहारिक पक्ष ये है कि उन्नाव में एक लड़की का 6 महीने पहले रेप किया जाता है। लडक़ी पुलिस में शिकायत करती है, केस दर्ज होता है, आरोपी पकड़ा भी जाता है। लेकिन कोर्ट आरोपी को जमानत पर रिहा कर देती है, केस चलता रहता है। पीड़ित लड़की केस के सिलसिले में जब कोर्ट में गवाही देने जा रही होती है तब आरोपी गांव के बाहर ही लड़की को ज़िंदा जला देता है। लड़की की गलतीं ये की उसके साथ रेप हुआ और उसने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई। उसका दर्द कोई समझ सकता है? (Unnao Gangrape)

अब बात करतें है हमारे तथाकथित सभ्य समाज की। जिस समाज का हवाला देकर स्वरा भास्कर और कुछ बुद्धिजीवी हैदराबाद पुलिस की कार्यवाही का विरोध कर रहे है। इसे मानवाधिकार का उल्लंघल भी बताया जाने लगा है। पहली बात ये की मानवाधिकार वाली गैंग आतंकवादियों, बलात्कारियों के लिए ही क्यों सक्रिय होती है? दूसरी बात ये की मानव अधिकार मानव के लिए होतें है, शैतानो के लिए नही। महिलाओं के साथ दरिंदगी करने वाले मानव है ही नही इसलिए उनके अधिकारों की बात करना फ़िजूल है।

दिल्ली की निर्भया (Nirbhaya) को कौन भूल सकता है? कितने साल हो गए उसके साथ दरिंदगी को? कोई बतायेगा निर्भया के कितने आरोपियों को इतने साल बाद भी फांसी हुई हो? न्याय की ऎसी सड़ी हुई व्यवस्था का जिम्मेदार कौन है? गुनहगारों को सज़ा देना अदालतों का काम है और इसे अमल में लाना कार्यपालिका का। अगर ये अपना काम ईमानदारी से कर लेते तो पुलिस को ऐसे एनकाउंटर की जरूरत पड़ती? पुलिस के साथ ही पूरा देश जानता है कि लड़कियों के साथ दरिंदगी करने वाले जैल में भी मौज काटेंगे और जब बाहर आएंगे दुबारा यही करेंगे। क्योंकि इन्हें फांसी देने की हिम्मत हमारे तंत्र में है ही नही।

सभ्य समाज वो होता है जिसमे अदालतें त्वरित न्याय सुनाए और अपराधी के मन मे सज़ा का खौफ हो। इस आधार पर हमारा समाज सभ्य तो कतई नही कहा जा सकता। इसलिए सभ्य समाज के नाम पर दी जा रही दलीलें आधारहीन है। पुलिस के ऐसे एनकाउंटर फिलहाल न्याय की एकमात्र उम्मीद दिखाई देतें है। तेलुगु पुलिस से पूरे देश की पुलिस को प्रेरणा लेना चाहिए। अपराधियों को लड़की के साथ जबर्दस्ती करने से पहले पुलिस की गोली का ख्याल आना चाहिए तभी तस्वीर बदल सकती है। (Unnao Gangrape)

पुलिस की इस कार्यवाही पर संशय सिर्फ इतना है कि इस तरह का इंसाफ कभी बड़ी मछलियों के साथ भी किया जाएगा या फिर सिर्फ छोटी मछलियां ही मारी जाएगी? बड़े-बड़े नामदार जिन पर बलात्कार के आरोप लगतें है क्या पुलिस उनका भी क्राइम सीन रिक्रिएट करवाकर एनकाउंटर करेगी? हैदराबाद के सभी आरोपी गरीब थे, उनके लिए कोई आवाज़ उठाने वाला नही था। लेकिन जिस आरोपी के पास पैसा है, ताकत है, रसूख है क्या उनको भी ये सज़ा दी है सकती है? जिस दिन पुलिस बलात्कार के बड़े आरोपियों का भी इसी तरह इंसाफ करने लगेगी उस दिन से देश मे बलात्कार बंद हो जाएंगे। देखतें है पुलिस के इरादे कितने बुलन्द है?

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           – सचिन पौराणिक

 

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