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Talented View : नेता चुनावी मौसम में असली रंग में आ रहे..

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फ़िल्म जॉली एलएलबी-2  का वह दृश्य सभी को याद है, जब हिन्दू संत के वेश में छिपे एक आतंकी इकबाल कादरी का भंडाफोड़ किया जाता है। फ़िल्म में वकील जॉली का रोल कर रहे अक्षय कुमार अदालत में उस आतंकवादी से हिन्दू धर्म से जुड़े कई जटिल प्रश्न पूछते हैं और वह सबके सही जवाब भी देता है, लेकिन आखिर में लगातार कठिन सवालों से तंग आकर उसके मुंह से “या अल्लाह” निकल आता है। तब जाकर वह अपनी असली पहचान स्वीकार करता है कि वह कोई संत नहीं बल्कि आतंकवादी इकबाल कादरी है। यह फिल्मी दृश्य आज इसलिए याद आ गया क्योंकि जैसे फ़िल्म के क्लाइमेक्स में रोमांच चरम पर होता है, वैसे ही राजनीति में चुनावी मौसम में रोमांच सबसे ज्यादा हो जाता है।

5 साल तक ‘रिलेक्स मोड’ में रहने वाले नेता चुनावी दौर में ‘हाइपर एक्टिव मोड’ में आ जाते हैं। जैसे फ़िल्म में क्लाइमेक्स में ही किरदारों की असलियत पता चलती है, वैसे ही चुनावी मौसम में नेताओं की असलियत भी उजागर हो जाती है। कौन नेता क्या सोचता है, उसके दिल में क्या है, किसके लिए प्यार है, किसके लिए नफरत है, जैसी तमाम चीजें चुनाव के समय ही सामने आ पाती हैं।

मायावती ने देवबंद में एक रैली में चुनावी आचार संहिता की धज्जियां उड़ा दी। बहनजी ने कहा कि मुसलमानों को सिर्फ गठबंधन को ही वोट देना चाहिए। कांग्रेस को वोट देकर मुसलमान अपना वोट बर्बाद न करे। बहनजी की बात सुनकर लगा कि उन्हें सिर्फ मुसलमानों की ही फिक्र है, समाज के बाकी तबकों से उन्हें कोई मतलब नहीं। महागठबंधन का यूपी में हिसाब सीधा है। उन्हें सिर्फ मुसलमानों, दलितों और यादवों के वोट चाहिए इसलिए क्योंकि बाकी जनता से वे वोट मांगना भी नहीं चाहते। उनकी कोशिश यही रहती है कि इस वोट बैंक का बिखराव न हो।

गठबंधन यदि खुलकर मुसलमानों के पक्ष में आ गया है तो योगी आदित्यनाथ ने भी इसी दिशा में घोड़े दौड़ा दिए। योगी ने कहा कि- “उन्हें अली पर भरोसा है और हमें बजरंगबली पर।” वैसे योगी यह न भी कहते तो भी सभी जानते हैं कि वे यूपी के ‘हिन्दू हॄदय सम्राट’ है।

इधर, कांग्रेस ने भी वायनाड में मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों से गठबंधन करके और इमरान मसूद जैसे बदजुबान नेता को सहारनपुर से टिकट देकर मुसलमानों को एक संदेश देने की कोशिश की है। यूपी के मुसलमानों में कांग्रेस या गठबंधन के बीच किसी एक को चुनना बहुत दुविधापूर्ण है, लेकिन जिस तरह से नेता चुनावी मौसम में अपने असली रंग में आ रहे हैं, उससे जनता हैरान है। गठबंधन और कांग्रेस दोनों का मुख्य निशाना मुसलमान वोटबैंक ही है। ऐसे में बाकी समाज भला क्या सोचता होगा?  यदि एक पक्ष सिर्फ मुसलमानों से वोट की अपील कर रहा है तो दूसरा पक्ष स्वाभाविक रुप से हिंदुओं से अपील करेगा।

ऐसे हालातों में लड़ाई सीधे तौर पर हिन्दू-मुसलमान की हो जाएगी और जनता के मुद्दे काफी पीछे छूट जाएंगे। फ़िल्म के क्लाइमेक्स की तरह चुनाव में भी किरदारों की असलियत जनता के सामने आ रही है। अब यह जनता के ऊपर है इन्हें पहचानना और वोट देते समय याद रखना। कौन नेता किस धर्म-मजहब से प्यार करता है और किससे नफरत, यह जनता जान चुकी है।

हालांकि फिल्म के क्लाइमेक्स में विलेन अपनी गलतियां स्वीकार कर लेता है, लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं होता। यहां सब कुछ होने के बाद भी नेता बेशर्मी का चोला पहने रहते हैं। अपनी असलियत जनता के सामने आ जाने पर भी ये लगातार झूठ बोलते रहते हैं। जनता को यह समझ लेना चाहिए कि किसी विशेष धर्म-मजहब से प्यार करने वाले नेता देश का भला नहीं कर सकते। इसलिए इस बार अपना वोट उसे दें जो धर्म-मजहब से उर उठकर देश से प्यार करता हो, देश के लिए जीता-मरता हो।

Talented View : कमज़ोर होने की कीमत चुका रही कांग्रेस

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