Talented View : इनके फेर में पड़ने वाला पानी भी नहीं मांगता

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न्यूज़ चैनलों की एक अलग ही दुनिया है। फुल मेकअप में चमक-दमक के साथ सनसनी परोसती सुंदरियों से लेकर सूट-बूट में आकर “तिल का ताड़” बनाते एंकर हर चैनल पर नज़र आ जाते हैं। कुछ चैनल जहां शालीनता के साथ आज भी सिर्फ ‘खबर’ ही दिखा रहे हैं वहीं ज्यादातर चैनल नाटकीयता भरे अंदाज़ में सिर्फ उत्तेजना पैदा कर रहे हैं। ये लोग एक साधारण ख़बर को भी इस तरह पेश करते हैं मानो ये खबर नहीं देखने पर आपका कोई बड़ा नुकसान हो जाएगा।

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ख़बरों पर ये इतनी परतें बना देते हैं कि असली खबर तक कोई दर्शक पहुंच ही नहीं पाता। सबसे ज्यादा रोचक शो इन चैनलों पर ‘बहस’ वाले होते हैं। 2-3 अतिथि बुलाकर ये चैनल गरमा-गरम और मसालेदार बहस करवाते हैं। ऐसी बहस में न्यूज़ एंकर की यह कोशिश होती है कि बहस को इतना भड़का दिया जाए, जिससे गुस्से में आकर किसी प्रवक्ता के मुंह से कोई आपत्तिजनक शब्द निकल आए।

इसके बाद बहस के सारे मुद्दों से ध्यान हटाकर ये लोग केवल उस एक ‘टिप्पणी’ पर ध्यान केंद्रित करतें हैं और उस बेचारे प्रवक्ता पर चढ़ बैठते हैं। ‘बेचारा’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि वह बंदा वाकई में इन चैनलों की सस्ती टीआरपी बटोरने का जरिया मात्र बनता है। उसे ‘बलि का बकरा’ बनाने के लिए बाकायदा पूरी स्क्रिप्ट लिखी जाती है। 2014 से पहले इन न्यूज़ स्टूडियो में भाजपा के प्रवक्ताओं को घेरा जाता था, लेकिन 2014 के सत्ता परिवर्तन के साथ ही यहां की रंगत भी बदलने लगी।

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हालात ऐसे हो गए कि कांग्रेस प्रवक्ताओं को इन बहसों में बोलने का मौका ही नहीं दिया जाने लगा। डिबेट के दौरान स्टूडियो के दृश्य पर एक नज़र डालिए। भाजपा का प्रवक्ता, एक संघ का प्रचारक, टीवी एंकर के वेश में भाजपा का छुपा एक प्रवक्ता और इन सबके बीच एक बेचारा कांग्रेस प्रवक्ता, जो कुछ ढंग का बोलना भी चाहे तो उसे चुप करवा दिया जाता है।

ऐसे हालातों में कांग्रेस के प्रवक्ता अपना आपा खोने लगते हैं। रागिनी नायक, राजीव त्यागी, पवन खेड़ा से लेकर आलोक शर्मा तक कांग्रेस के तकरीबन हर प्रवक्ता ने इन हालातों में न्यूज़ स्टूडियो में अपशब्द कहे। जनता पर्दे के पीछे का खेल नहीं समझ पाती, लेकिन कांग्रेस नेताओं की बदज़ुबानी ज़रूर उन्हें याद रह जाती है। टीवी बहस, जो जनता के बीच अपनी बात रखने का मंच था, उस मंच पर लगभग हर खबरिया चैनल के स्टूडियो में कांग्रेस प्रवक्ताओं की घेराबंदी की गई। चुनाव हारने के बाद आत्मावलोकन की बारी आई, तब कांग्रेस को समझ आया कि इन टीवी डिबेट में शामिल होने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ा है। तब कांग्रेस आलाकमान ने 1 महीने के लिए अपने प्रवक्ताओं को टीवी बहस में शामिल न करने का फैसला लिया।

इधर, कांग्रेस प्रवक्ता के बहस में शामिल न होने से बहस की धार कुंद पड़ गई क्योंकि अगर जंगल में शिकार ही नही होगा तो शिकारी को आनंद कैसे मिलेगा? भाजपा का पक्ष रखने वाले ही लौग आपस मे आखिर कितनी देर बात कर सकते है? कांग्रेस प्रवक्ताओं के टीवी बहस में न शामिल होने से प्रवक्ताओं को भी बड़ी राहत मिली है।

अब राहुल गांधी चाहे विदेश जाए या चाहे जो बयान दे, उन्हें इस पर सफाई देने की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि पहले कांग्रेसी प्रवक्ता इसी टेंशन में रहते थे कि युवराज कुछ उलजलूल कह देंगे तो इसका जवाब उन्हें देना पड़ेगा। अब कांग्रेस प्रवक्ता भी मजे में है और ऐसी खबरें आ रही है कि एक महीने की ये मियाद आगे बढ़ाई जा सकती है। कांग्रेस के प्रवक्ता टीवी बहस से पहले ही दूरी बना लेते तो चुनाव में भी उनकी कुछ सीटें और बढ़ जाती। कांग्रेस आलाकमान को चाहिए कि टीवी बहस में न शामिल होने के निर्णय को हमेशा के लिए लागू कर दें क्योंकि इन बहसों में उत्तेजना, शोर-शराबा और पक्षपात के अलावा कुछ नहीं होता है। बहस के शो में इतनी नाटकीयता होती है कि आम दर्शक का बीपी बढ़ना तय होता है।

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हालात ऐसे हैं कि न्यूज़ वाले टीआरपी के लिए स्टूडियो में गोलियां भी चलवा सकते हैं। हालांकि कांग्रेस से कोई सहानुभूति नहीं है क्योंकि ये लोग भी अपने राज्य में मीडिया का ऐसे ही दुरुपयोग करते थे, लेकिन मीडिया का ये चेहरा वाकई क्रूर है। ये लोग सत्ता के साथ रहते हैं और सिर्फ अपनी कमाई पर ध्यान देते हैं। इनके फेर में पड़ने वाला पानी भी नहीं मांगता। हालात ऐसे ही रहते हैं तो कांग्रेस प्रवक्ताओं के साथ ही दर्शकों को भी इन चैनलों का बहिष्कार करना पड़ेगा।

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