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Talented View : सबको बताना चाहिए कि इस्लाम अमन का मज़हब है

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नौशेरा में तैनात एक फौजी मित्र से कुछ दिन पहले कश्मीर के हालात पर चर्चा हो रही थी। फौजी मित्र का कहना था कि 2-3 जिलों को छोड़कर शेष कश्मीर में हालात तेज़ी से सुधर रहे हैं। सुरक्षा बलों के ऑपरेशन पर मित्र ने बताया कि लोकल सपोर्ट अगर आतंकियों को न मिले तो आतंकवाद खुद ही खत्म हो जाए। यहां के लोकल आतंकवादियों को बचाने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। पत्थरबाज़ी के सवाल पर मित्र ने कहा कि जुम्मे के दिन हालात ज्यादा खराब हो जाते हैं। जुम्मे की नमाज़ खत्म होते ही सभी पत्थरबाज इकट्ठे हो जाते हैं और इसी दिन आइसिस के झंडे भी लहराए जाते हैं। हर जुम्मे को अमूमन ऐसे ही हालात बन जाते हैं। जुम्मे के दिन मस्जिदों में जाने कैसी तकरीर दी जाती है, जिससे कश्मीर का युवा अपने वतन का ही दुश्मन बन बैठता है।

2017 में डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की हत्या भी इस भीड़ ने जुम्मे के ही दिन की थी, जुम्मे की नमाज़ के बाद ही पत्थरबाज़ी की घटनाएं बढ़ जाती है और जुम्मे की नमाज़ के बाद ही उग्र प्रदर्शन किए जाते हैं। कहने को मस्जिद नमाज़ पढ़ने और इबादत की जगह मानी जाती है, लेकिन लगता है यहां के मौलवी इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को कोई दूसरा ही सबक सिखलाने में लगे हुए हैं।

खैर, खबर आ रही है श्रीलंका से, जहां सरकार ने सभी मस्जिदों को आदेश दिया है कि यहां दिए जाने वाले उपदेशों को रिकॉर्ड करके सरकार को भेजा जाए। श्रीलंका में बीते दिनों हुए बम विस्फोटों के कारण और उसके बाद मस्जिदों से हथियार बरामद होने के बाद यह कदम उठाया गया है। श्रीलंका में मुस्लिम धार्मिक मामलों के मंत्री ने एक बयान जारी किया है। इस बयान में कहा गया है, “देश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए मस्जिदों के प्रबंधकों को निर्देश दिए जाते हैं कि वे मस्जिदों में होने वाले जुम्मा के खुतबे (धार्मिक संबोधन) और अन्य चीजों की ऑडियो रिकॉर्डिंग मंत्रालय को भेजें।“

श्रीलंका में हुए विस्फोटों का जब से मस्जिद कनेक्शन सामने आया है, उसके बाद से श्रीलंका सरकार लगातार ऐसी कार्रवाई कर रही है। दुनिया में जहां भी आतंकी वारदात होती है, वहां की मस्जिदों से उनके तार ज़रूर जुड़े होते हैं। मस्जिदों से हथियार भारत में भी कई जगहों से बरामद हो चुके हैं। ऐसे में श्रीलंका की इस कार्रवाई से भारत को भी सबक लेने की ज़रूरत है। यदि आतंकी वारदातें किसी धार्मिक जगह से अंजाम दी जा रही हैं तो उन पर कार्रवाई होनी ही चाहिए क्योंकि मस्जिदें, मदरसे यदि आतंक का अड्डा बनने लगेंगे तो इससे इस्लाम की बदनामी नहीं होगी ? मस्जिदों से आतंक को बढ़ावा मिलता है तो इसकी सूचना खुद मुस्लिमों को पुलिस और सेना को देना चाहिए। कुछ मौलानाओं और मौलवियों की जहरीली तकरीरों से मुसलमान पूरी दुनिया में बदनाम हो रहे हैं। यह भी सभी जानते हैं कि मस्जिद से सिर्फ इस्लाम की नहीं बल्कि राजनीति, फतवे, नफरत हर तरह की बातें की जाती है।

पुराने दंगों का ट्रेंड भी देखा जाए तो जुम्मे की नमाज़ के बाद ही दंगों की आग ज्यादा भड़कती है। श्रीलंका सरकार जो कार्रवाई कर रही है वो कार्रवाई मुस्लिम नेताओं को पहले ही कर लेनी चाहिए थी। मस्जिद से आतंक फैलाया जाएगा तो फिर आतंक का मजहब भी अपने आप तय हो ही जाएगा। आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए धर्म/मज़हब कभी आड़े नहीं आना चाहिए। मंदिर हो, गिरिजाघर हो, गुरुद्वारे हो चाहे स्थानक हो,  यदि कोई भी आतंकवादियों की मदद कर रहा है तो उन पर कठोर कार्रवाई होना ही चाहिए। मस्जिदों में रिकॉर्डिंग का सभी मुस्लिमों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि अगर मस्जिद से सिर्फ अमन, भाईचारे और मोहब्बत की बातें की जाती है तो पूरी दुनिया इसे सुने क्या तकलीफ है ? एक कदम आगे बढ़कर जहां सरकारों ने यह कानून नहीं बनाया है, वहां भी मुस्लिमों को खुद ही रिकॉर्डिंग करवानी चाहिए और सबको बताना चाहिए कि इस्लाम अमन का मजहब है। लेकिन अगर उस कार्रवाई का भी विरोध होता है तो फिर यही सोचने में आएगा कि दाल में कुछ काला ज़रूर है।

Talented View : “काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती”

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