अखिलेश का गैर-जिम्मेदार व्यवहार, मोदी का आधार

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बात 2014 से पहले की है। बॉलीवुड के प्रसिद्ध कलाकार बाबुल सुप्रियो एक फ्लाइट में योगगुरू बाबा रामदेव के पास बैठे थे। बातों ही बातों में बाबा ने सुप्रियो को भाजपा से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर दे दिया। सुप्रियो ने कहा, “चुनाव लड़ने में कोई दिक्कत नहीं, लेकिन मेरे पास खर्च करने के लिए रूपए नहीं  हैं। बाबा ने कहा, “इस बारे में निश्चिंत रहो और चुनाव लड़ने की तैयारी करो।“ इसके बाद सुप्रियो भाजपा के चुनाव निशान पर चुनाव लड़े और बंगाल से जीते भी। पूरे बंगाल में भाजपा सिर्फ 2 सीटें जीतने में कामयाब रही। उनमें एक से बाबुल सुप्रियो जीत आए थे।

कल बनारस से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनावी ताल ठोक रहे तेजबहादुर यादव का नामांकन निरस्त हो गया। पूर्व बीएसएफ जवान ने दो पर्चे दाखिल किए थे। एक निर्दलीय के तौर पर तो दूसरा समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर, लेकिन दोनों ही पर्चे तकनीकी खामियों के कारण खारिज हो गए। इसके साथ ही विपक्ष के प्रधानमंत्री को बनारस में घेरने के अरमानों पर भी पानी फिर गया। वैसे बनारस का मुकाबला पहले से एकतरफा था, लेकिन तब भी तेजबहादुर के मैदान में कूदने के बाद से मुकाबला थोड़ा रोचक ज़रूर हो गया था। तेजबहादुर का नामांकन खारिज़ होने के लिए विपक्ष प्रधानमंत्री और भाजपा पर आरोप लगा रहा है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। यदि मोदी के इशारे पर नामांकन निरस्त होते तो क्यों नहीं अखिलेश यादव और डिंपल यादव के नामांकन भी निरस्त हो जाते ?

हकीकत यह है कि बड़े नेताओं के चुनावी पर्चे को बड़ी सावधानी से भरा जाता है। वकील, सीए और कानून के विशेषज्ञ हर जानकारी पर पैनी नज़र रखते हैं। पूरे फॉर्म और उसके साथ दी जाने वाली जानकारियों को अच्छे से जांचा जाता है। उसके बाद उनका पर्चा डाला जाता है, लेकिन बेचारे तेजबहादुर के पास ऐसी टीम कहां ? उसके पर्चे को कौन जांचेगा? सिर्फ प्रत्याशी घोषित करने से ही अपने कर्तव्यों की ‘इतिश्री’ हो जाती है क्या? समाजवादी पार्टी के और किसी उम्मीद्वार का तो पर्चा नहीं  निरस्त हुआ, सिर्फ तेज़बहादुर के साथ ही ऐसा क्यों हुआ? इसका मतलब साफ है कि उन्हें पार्टी की तरफ से कोई मदद नहीं  मिली। उन्हें सिर्फ प्रत्याशी घोषित करके लावारिस छोड़ दिया गया। उन्हें न तकनीकी मदद दी गई न आर्थिक और न ही राजनैतिक ।

भला ऐसे चुनाव लड़े जाते हैं क्या? मोदी जैसे वजनदार उम्मीद्वार के खिलाफ तेजबहादुर और कुछ न कर पाते, लेकिन कम से कम माहौल तो बना ही देते। ऐसे मामलों में लापरवाही में अखिलेश यादव की नादानी दिखती है। क्यों नहीं तेजबहादुर को यह मदद मुहैया कराई गई, उन्हें किसके भरोसे अकेला छोड़ दिया गया? उनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि भी नहीं थी इसलिए उनकी गलती माफी के लायक है, लेकिन अखिलेश जैसे शख्स की इतनी बड़ी गलती पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है।

अखिलेश अपने इस रवैये के साथ पार्टी का भट्ठा बैठा देंगे, इसमें कोई शक नहीं है। बाबुल सुप्रियो बंगाल से चुनाव लड़े और जीते, जिसमें सबसे बड़ी भूमिका पार्टी नेतृत्व की थी। पार्टी ने हर मुकाम पर सुप्रियो की मदद की। उन्हें लोकल सपोर्ट से लेकर हर मदद मुहैया करवाई, तब जाकर वे बंगाल से जीत पाए। अखिलेश जैसा नेतृत्व भाजपा में होता तो सुप्रियो भी कभी संसद का मुंह नहीं देख पाते। तेजबहादुर अब गुमनामी की गलियों में खो जाएंगे तो इसकी जिम्मेदारी अखिलेश यादव की भी होगी। अखिलेश अपनी पार्टी के भस्मासुर बन गए है। राजनीति के ये पप्पू-टीप्पू अपनी पार्टियों की ही कब्र खोदने में लगे हुए हैं। इनके गैर-जिम्मेदार व्यवहार के चलते ही बनारस की लड़ाई एकतरफा हो गई है। अब सिर्फ यह देखना है कि मोदी बनारस में कितने लाख वोटों से जीतने वाले हैं ?

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