Talented View : न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम

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एक आदमी को भंडारे में खाना खाने का बहुत शौक था। शहर में कहीं भी भंडारा होता तो वह ज़रूर पहुंच जाता था, लेकिन एक बार उस आदमी की किस्मत खराब थी। भंडारे में जब वह पहुंचा तो पूड़ियां खत्म हो चुकी थीं। मन मसोसकर जब वो बाहर आया तो उसके होश उड़ गए। उसकी चप्पलें भी कोई चुरा ले गया था। न उसे भंडारे में पूड़ियां मिली ऊपर से आए चप्पल अलग चोरी हो गए। उस दिन से उसने कसम खाई कि आज के बाद से किसी भंडारे में शामिल न होऊंगा।

ये कहानी आज अचानक इसलिए याद आ गई क्योंकि चंद्रबाबू नायडू के साथ कुछ ऐसा ही घटित हो गया है। तेलगुदेशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू कुछ दिन पहले तक राष्ट्रीय राजनीति के एक प्रमुख चेहरे थे। भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने के लिए उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था। उनके खुद के आंध्रप्रदेश में विधानसभा चुनव भी हो रहे थे, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने अपना ध्यान मोदी को रोकने पर ही लगाए रखा।

Talented View : उन्हें परेशान करने का भी उन्हें कोई हक़ नहीं बनता

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक नेताओं से उनके घर जाकर नायडू ने मुलाकातें कीं और भाजपा विरोधी शक्तियों को एकजुट करने की कोशिश की। ममता बनर्जी, शरद पवार, स्टालिन, सोनिया गांधी, मायावती सहित तकरीबन हर दल से नायडू ने बातचीत की। उनकी भरसक कोशिशों के बाद भाजपा पहले से ज्यादा शक्तिशाली होकर सत्ता में लौटी, लेकिन चंद्रबाबू की खुद की ज़मीन खिसक गई। उनकी पार्टी की विधानसभा के साथ ही लोकसभा में भी करारी हार हुई।

चंद्रबाबू के अथक परिश्रम के बाद भी न तो विपक्षी एकता बन पाई और न ही भाजपा को रोका जा सका। उल्टे चंद्रबाबू जैसे ही छुट्टियां मनाने विदेश पहुंचे, उनके पीछे उनकी पार्टी के सांसदों ने पूरी पार्टी का ही भाजपा में विलय कर डाला। टीडीपी के 6 में से 4 राज्यसभा सांसद कल भाजपा में शामिल हो गए। अब चंद्रबाबू की हालत ठीक वैसी ही हो गई है, जैसी भंडारे में गए उस आदमी की हो गई थी। उन्हें न राज्य की सत्ता मिली न लोकसभा में ताक़त और अब बचे-खुचे सांसदों पर भी किसी की नज़र लग गई।

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वे समझ नहीं पा रहे हैं कि उनसे गलती आखिर कहां हुई? उनकी पार्टी की हालत ताश के पत्तों के महल के समान हो गई है। बस एक हवा के झोंके से टीडीपी तिनका-तिनका बिखर जाएगी। मोदी विरोधी मोर्चे की अगुवाई करने की बड़ी भारी कीमत नायडू चुका रहे हैं। भगवान जाने अब वे छुट्टियां भी पूरी करेंगे या फिर बीच में  ही भारत लौट आएंगे इसलिए कहा जाता है कि राजनीति में विरोध भी रचनात्मक होना चाहिए। किसी का अंधविरोध आपकी हालत चंद्रबाबू जैसी बना सकता है।

वैसे नायडू की नीयत में कोई शक नहीं किन्तु उनकी किस्मत ज़रूर खराब थी। उन्होंने सोचा था कि विपक्ष को एकजुट कर लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। विपक्ष आज भी यह तथ्य समझ नहीं रहा है कि कोई पार्टी अकेले मोदी को नहीं रोक सकती, लेकिन ये दल कभी एक साथ आ नहीं सकते। इस वजह से मोदी के अश्वमेध का घोड़ा निर्बाध दौड़े जा रहा है।

फिलहाल नायडू की हालत पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। हो सकता है वो भी मन में यह कसम खा रहे हों कि आगे से किसी भंडारे में नहीं जाना है। उनकी हालत देखकर एक शेर याद आ रहा है:

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“न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे न उधर के  रहे

दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम, न इधर के रहे न उधर के रहे”

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