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Talented View : बच्चों के मन में जहर भरने की कोशिश क्यों ?

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“होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं, गिले-शिकवे भूल के दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं” शोले फ़िल्म का यह गाना आज भी होली क़रीब आने पर बरबस ही जुबां पर आ जाता है। होली का त्योहार है भी ऐसा ही, जिसमें सभी मनमुटाव, दुश्मनी और वैमनस्य रंगों के बीच गायब हो जाते हैं। होली के त्योहार को सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदाय के लोग मिलजुलकर बिना किसी भेदभाव के मनाते हैं।

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आजकल होली के रंगों को भी साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। हिन्दुस्तान यूनिलीवर जैसे विश्वविख्यात ब्रांड के हालिया सर्फ एक्सेल के विज्ञापन द्वारा ऐसा ही जहर समाज में घोलने की कोशिश की जा रही है। सर्फ एक्सेल के विज्ञापन में दिखाया गया है कि एक हिन्दू लड़की मोहल्ले के बच्चों के सभी रंग और गुब्बारे अपने ऊपर झेल लेती है। इसके बाद वह एक मुस्लिम बच्चे को अपनी साइकिल के पीछे बैठाकर मस्जिद तक छोड़ आती है, जिससे उस पर रंग न लग जाए।  ऐसे वाहियात और गैर जिम्मेदार विज्ञापन पर बीते कुछ दिनों से जनता का गुस्सा फूट रहा है। ट्विटर, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सर्फ एक्सेल सहित एचयूएल कंपनी के सभी उत्पादों के बहिष्कार की मुहिम शुरू हो गई है।

ई-कॉमर्स कंपनी जैसे अमेज़न, फ्लिपकार्ट द्वारा भी एचयूएल पर शिकंजा कसा जा रहा है। इस कंपनी के उत्पाद भारी मात्रा में ‘कैश ऑन डिलीवरी’ मोड पर मंगवाए जा रहे हैं और उन्हें स्वीकार नहीं किया जा रहा है। इस एड को बनाने वाले और इसे अप्रूव करने वालों को नौकरी से बर्खास्त करने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। सवाल है कि एचयूएल जैसी कंपनी को रचनात्मकता के नाम पर क्या सिर्फ धर्म-मजहब ही समझ में आता है? होली के रंग मुस्लिम बच्चे पर लग जाएंगे तो इससे कौन-सा भारी नुकसान हो जाएगा? मासूम बच्चों के मन में इतना जहर भरने की साजिश क्यों की जा रही है कि होली के रंग बुरे होते हैं?

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हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर जिहादी मानसिकता का प्रचार एचयूएल जैसी कंपनी द्वारा क्यों किया जा रहा है? मुस्लिम बच्चों को नमाज़ छोड़कर होली खेलते हुए दिखाने से भी साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया जा सकता था, लेकिन इस विज्ञापन का असली उद्देश्य क्या यही था कि हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाए ? कॉमन सेंस से सोचा जाए तो रंग लगाने वाले त्यौहार क्या खून बहाने वाले त्योहारों से बेहतर नहीं ?

सभी को रंगों में भिगोकर अपना बना लेने वाले उत्सव किसी निर्दोष की गर्दन पर छुरा चलाने से बेहतर नहीं, लेकिन इसके बाद भी रंगों के त्योहार के बहाने बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ करने से एचयूएल बाज़ नहीं आ रहा है तो जनता का गुस्सा भड़कना बिल्कुल स्वाभाविक है। इतने बड़े पैमाने पर अहिंसक विरोध किसी कंपनी का किया जा रहा है तो कंपनी को अपने गिरेबान में झांकने की ज़रूरत है। एचयूएल जैसी विदेशी कंपनियों को, जो भारत से ही पैसा कमाती है, कोई हक नहीं इस देश के सौहार्द को बिगाड़ने का।

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होली के रंगों में डूबकर, रंगों से सराबोर होकर हर धर्म-मजहब के लोग होली खेलते आए हैं, लेकिन एचयूएल को यह सौहार्द शायद हज़म नहीं हो रहा है। होली जैसे विश्व के अनूठे त्योहार को बदनाम करने वाले एचयूएल पर कार्रवाई होनी चाहिए। हो सकता है कि सरकार नियमों से बंधी हुई है, लेकिन जनता के स्वस्फूर्त विरोध को नहीं दबाया जा सकता है। एचयूएल को सबक सिखाने के लिए प्रबुद्धजन इकठ्ठे हो रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं की यह विरोध रंग लाएगा और कंपनी अपने गलत इरादों में कामयाब नही हो पाएगी।

-सचिन पौराणिक

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