website counter widget

Talented View : हादसे हो जाने के बाद ही क्यों टूटती है हमारी तंद्रा ?

0

रेलवे के क्वार्टर्स देखे हैं कभी आपने ?  रेलवे कॉलोनी में दाखिल होते ही चारों तरफ हरियाली दिखाई देने लगती है। हर रेलवे कर्मचारी जब भी इन क्वार्टर्स में रहने आता है तो वह अपनी पसंद के कुछ पेड़ ज़रूर घर में लगाता है। इसकी वजह है कि रेलवे क्वार्टर बने ही कुछ इस तरह से होते हैं कि उनमें भरपूर खुली जगह होती है।

झोपड़ीनुमा शक्ल में बने ये क्वार्टर बेशक बहुत सुविधासंपन्न नहीं होते हैं, लेकिन इनमें रहने का आनंद ही अलग होता है। चारों तरफ से खुले इन घरों में आंगन और पीछे दालान में अनेक पेड़-पौधे लगे होते हैं।

Fire Broke Out In Surat LIVE VIDEO : 3 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज

Today Cartoon On Surat Fire Accident

ऐसा ही नज़ारा लगभग हर सरकारी कॉलोनी में देखने को मिलता है। चाहे वो अधिकारी निवास हो, सिंचाई कॉलोनी हो या पुलिस लाइन, लेकिन इन घरों में रह चुके कर्मचारी या अधिकारी जब अपना खुद का घर बनाते हैं, तब न जाने उन्हें क्या हो जाता है?  उनके घरों में हरियाली के लिए कहीं जगह नहीं छोड़ी जाती।

हरियाली भी आजकल दूर की कौड़ी हो गई है क्योंकि आजकल बनने वाले घरों में खिड़कियां तक नहीं होती है। हर कमरे में ऐसी लगना है तो खिड़कियों की ज़रूरत ही क्या? दशकों तक रेलवे के हवादार क्वार्टर में रहने वाली एक आंटी ने बातचीत में जिक्र किया कि उन्हें अपना नया घर बिल्कुल पसंद नहीं आता है।

अपने सुविधा संपन्न नए घर में ऐसी की हवा में भी उन्हें घुटन महसूस होती है। वे याद करती हैं उन दिनों को, जब वे रेलवे कॉलोनी में अपने परिवार के साथ प्रकृति के करीब रहा करती थीं। बिना ऐसी और अन्य सुविधाओं के भी जो सुख उन्हें उस क्वार्टर में मिलता था, वह आलीशान नए घर में नहीं मिल रहा, लेकिन इंसान करे भी क्या ? जमीनों के दाम ही इतने बड़े हुए हैं कि पेड़ लगाने को वह ज़मीन लाए भी कहां से ?  ऐसे हालातों में जब कोई व्यावसायिक इमारत बनाई जाती है तो एक-एक इंच जगह की प्लानिंग की जाती है।

Talented View : मोदी आए भी और छाए भी…

यदि  तीन मंजिला निर्माण की अनुमति मिलती है तो उसका पूरा उपयोग करने की कोशिश की जाती है। पार्किंग की जगह तलघर बनाकर उसका भी व्यावसायिक इस्तेमाल किया जाता है तो ऊपर के तल पर टीन-शेड डालकर एक नए तल का अतिरिक्त फायदा उठाया जाता है। इस तरह तीन मंजिल की इमारत 5 मंज़िल की हो जाती है इसीलिए नगर निगम जैसे महकमों के अधिकारी निर्माण की अनुमति देने और नक्शा पास करने के लिए मोटी कमाई करते हैं।

अभी एक मित्र ने अपनी बिल्डिंग की अनुमति के लिए 1 लाख रुपए से ज्यादा की रिश्वत दी जबकि उसकी कुल फीस मात्र 25 हजार रुपए थी। ऐसे ही आवासीय मकानों में भी जैसे नक्शे पास किये जाते हैं, उसके अनुरूप निर्माण कभी नहीं किया जाता है।

नगर निकायों की इस जालसाजी पर फिर एक दिन चर्चा करेंगे। फिलहाल, सूरत अग्निकांड की तस्वीरें देखकर देश विचलित हो गया है। सूरत की उस इमारत में भी सबसे ऊपरी मंजिल पर इसी तरह तीन शेड डालकर एक अवैध तल का निर्माण किया गया था। उसे चारों तरफ से कवर करके एक फ्लोर का रूप दे दिया गया था।

चूंकि एक-एक इंच जगह के लिए मारामारी होती है इसलिए आपातकालीन रास्ता बिल्डिंग में बनाया ही नहीं गया था सिर्फ एक ही रास्ता था ऊपरी तल पर पहुंचने का और आग की चपेट में वो रास्ता भी आ गया था। ऐसी परिस्थिति के बारे में सोचकर ही रूह कांप जाती है।

Talented View : देश है तभी चुनाव है, नेता हैं और हम हैं

कोलाहल, धुएं और आग की लपटों के बीच बेचारे मासूम बच्चे कितना घबरा गए होंगे ? कुछ समझ न आता देख कुछ बच्चे इसलिए बिल्डिंग से कूद गए क्योंकि बेचारे आखिर क्या करते ? आग में जलने से उन्हें बिल्डिंग से कूदना ज्यादा सही लगा होगा। देखते ही देखते इस आग और अफरा-तफरी ने 20 मासूमों की बलि ले ली और कई अब भी अस्पताल में भर्ती हैं।

मासूमों के परिजन गमगीन हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके बच्चे की गलती आखिर क्या थी? बिल्डर और निगम के अधिकारियों की गलती की सज़ा उनके बच्चों को क्यों मिली?

मारे गए बच्चो में कई अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे, जिनके लिए उन्होंने जाने क्या सपने संजोए थे। इस घटना पर सिर्फ सूरत शहर ही नहीं बल्कि पूरा देश आंसू बहा रहा है। इस घटना पर दुःख सभी व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन अब सिर्फ दुःख जताना नाकाफ़ी होगा। ईमानदारी से अगर कार्रवाई की जाए तो इसकी जद में कोचिंग संचालक, बिल्डिंग मालिक से लेकर निगम के बड़े अधिकारी तक आ जाएंगे।

आखिर क्यों “स्पेस” की इस अंधी दौड़ में नियम-कानून ताक पर रख दिए जाते हैं? निगम के कर्मचारी-अधिकारी ऐसा क्यों सोचते हैं कि उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता? भूस्वामी भी आखिर क्यों कानून से डरते नहीं ? पैसों की भूख में क्या हम मासूमों को निवाला बनाने से भी बाज़ नहीं आ रहे है?

आखिर क्यों शहर में 90% निर्माण नियमों के मुताबिक नहीं होता और इसके लिए कोई दोषी ही नहीं है? सूरत हादसे के बाद प्रशासन को सचेत हो जाना चाहिए और हमें भी स्पेस की अंधी दौड़ से बाज़ आना चाहिए। हमे शहरों को कॉन्क्रीट के जंगल में तब्दील करने के बजाय प्रकृति से लयबद्ध होकर विकास करना होगा।

एक-एक इंच की मारामारी में व्यावसायिक इमारतों में सुरक्षा का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है और जब ऐसे हादसे हो जाते हैं, तब हमारी तंद्रा टूटती है। क्या किया जाए, क्या नहीं, यह सोचना प्रशासन और सरकारों का काम है। वो सोचे कि अब क्या करना है? हमारी विनती सिर्फ इतनी है कि कम से कम नौनिहालों की सुरक्षा का तो ध्यान रखा जाए।

बिल्डिंग से कूदते कुछ बच्चों की तस्वीरें आंख के सामने आ जाती है तो उसके बाद और कुछ न दिखाई देता है, न सुनाई देता है। सोचने-समझने की ताकत खत्म हो जाती है। अब सिर्फ यही प्रार्थना है की है ईश्वर! अपने चरणों में बच्चों को स्थान दें और उनके परिवारों को ये दुख सहन करने की शक्ति दे।

ट्रेंडिंग न्यूज़
Share.