समर शेष है…

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सुबह से शहर की सड़कों पर सन्नाटा पसरा है। न पोहे-समोसे की दुकान खुली है न चाय की, न किराना वाले आए न मिठाई-नमकीन वाले, न ऑटो पार्ट्स वालों ने दुकान खोली है न पंचर वाले ने। सभी वर्गों का ये स्वस्फूर्त बंद अपने आप में बहुत कुछ कह रहा है। ये आहत हैं जनता के उस गुस्से से, जिसे समझने को कोई पार्टी, कोई नेता तैयार नहीं है। जनता क्रोधित है, आवेश में है क्योंकि उनके बच्चों के भविष्य को गिरवी रखकर ऐसा कानून पास करवा दिया गया है, जिसमें न्याय की कोई उम्मीद ही नहीं है।

जनता के हितों पर कोरी बकवास करने वाले नेता परेशान हैं क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि इस गुस्से से कैसे निपटा जाये? ये विरोध न तो उग्र है, जिसमें दुकानों को लूटा जाता है न ही यह विरोध इतना निम्न है, जो सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए या फिर भोली जनता को परेशान करे। ये विरोध इतना शालीन और मर्यादित है कि इसे न बलप्रयोग से रोका जा सकता है और न ही झूठे आश्वासनों से।

स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं को पहले ही विरोध के दायरे से बाहर कर दिया गया है। अंदर ही अंदर प्रशासन, सरकार और विपक्ष भी समझ रहा है कि इनकी (सवर्ण/पिछड़ों) मांगें वाज़िब हैं, लेकिन वोटबैंक की सियासत में उलझे नेताओं की अपनी मजबूरी है। वैसे भाजपा की सरकार जब भी केंद्र में बनती है तो उनसे तीन स्वाभाविक उम्मीदें जनता को होती है- राममंदिर निर्माण, धारा 370 हटाना और पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना। इन तीन कामों को पूरा न कर पाने के पीछे अक्सर ये दलीलें दी जाती हैं कि मामला कोर्ट में चल रहा है इसलिए सरकार कुछ नहीं कर सकती। लेकिन तब सवाल है कि यदि सरकार सच में ही इतनी पंगु है तो चुनाव के पहले बेवजह चांद-तारे तोड़कर लाने की बातें क्यों जनता से की जाती है?

एट्रोसिटी एक्ट पर दलितों के वोट मिलेंगे इसलिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को किनारे कर दिया गया, लेकिन रामजी की यह मजबूरी है कि वे खुद तो वोट डाल नहीं सकते इसलिए उन्हें ‘तंबू’ में ही छोड़ दिया गया है। 20 राज्यों में सरकारें, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर, यूपी विधानसभा में प्रचंड बहुमत के बाद भी राममन्दिर नहीं बन सका तो धिक्कार है इस 56 इंच की सरकार पर। सरकार का रवैया देखिए, राममंदिर नहीं बना पा रहे, लेकिन रामभक्तों में आपस में फूट डलवाने का कानून अश्यादेश लाकर पारित भी करवा दिया गया।

इस एट्रोसिटी एक्ट पर कई संगठनों की भी असली तस्वीर सामने आ चुकी है, जिसमें सबसे बड़ा नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है। सरकार के हर मामले में सीधे दखल देने वाले संघ की इस मामले में चुप्पी सवालों के घेरे में है। जातिवाद की खिलाफत और समानता की बातें करने वाले संघ के नेताओं की इस निर्दयी कानून के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही है। इसके उलट संघ ने अपने स्वयंसेवकों का भी ऐसा ब्रेनवाश किया जा रहा है, जिससे वे भी इस काले कानून के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पा रहे हैं।

भारत मां के दो बेटे हैं, एक बेटा कमजोर है, एक शक्तिशाली है इसलिए उसे आरक्षण की ज़रूरत है, ऐसी कहानियां बना-बनाकर स्वयंसेवकों को बरगलाया जाता है। आइसिस और आतंकवादी संगठन भी भोले-भाले लोगों का ब्रेनवाश करके उन्हें फिदायीन बना देते हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि जिस दिन से इंसान खुद का दिमाग का इस्तेमाल बंद कर देगा, उसी दिन वह चलता-फिरता बम बन जाता है। खैर, सवर्ण-पिछड़ों की नाराज़गी ने सरकारों का चैन छीन लिया है इसमें कोई शक नहीं। सोशल मीडिया पर भाजपा के मुफ्त और तनख्वाह पाने वाले भक्तों को जागरूक जनता के किसी सवाल का जवाब देते नहीं बन रहा है।

‘भारत-बंद’ को मिल रहे समर्थन पर देश की राजनीति एक नई करवट ले सकती है क्योंकि सवर्ण और पिछड़ों ने मन बना लिया है कि इस बार देश, धर्म, हिंदुत्व और पार्टी को बचाने से ज्यादा ज़रूरी खुद को और अपने बच्चों के भविष्य को बचाना है। संघ जैसे संगठनों की ऐसे मामलों पर चुप्पी के ऐसे मौकों पर रामधारी दिनकर की ये पंक्तियां अनायास ही स्मरण हो आती हैं-

“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध”

-सचिन पौराणिक

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