Talented View : शिव की सेना के नए ‘पति’

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सत्ता पर नियंत्रण के दो रास्ते होतें है। एक चुनावी रास्ते से जनता द्वारा चुनकर सीधे पावर में आया जाए। दूसरा अपने रसूख, जनसमर्थन और व्यापक स्वीकार्यता की बदौलत सत्ता में सीधे शामिल हुए बिना रिमोट कंट्रोल द्वारा सत्ता चलवायी जाए। 2004 से 2014 तक देश ने देखा ही है कि कैसे सोनिया गांधी ने मनमोहनसिंह को रिमोट बनाकर सत्ता पर पूरी पकड़ बनाकर एक दशक तक लगातार देश पर शासन किया।

Talented View : हर बार नया थानेदार ?

रिमोट द्वारा सत्ता चलाने के फायदे भी है और नुकसान भी। सबसे बड़ा फायदा ये की बिना किसी कानूनी जिम्मेदारी के सत्ता की मलाई निर्बाध रूप से खाने को मिलती है तो नुकसान ये होता है कि अगर बंदा निष्ठावान न रहे तो दिक्कत बढ़ भी सकती है। जैसे बिहार में नीतीश ने जीतनराम मांझी पर भरोसा करके उन्हें मुख्यमंत्री बना तो दिया लेकिन इसके बाद मांझी में अपनी ही नैय्या पार लगानी शुरू कर दी थी। मांझी नीतीश के वफादार नही रहे, लेकिन मनमोहन सिंह ने गांधी परिवार के प्रति वफ़ा कभी कम नही होने दी।

आज महाराष्ट्र में रिमोट द्वारा सरकार चलाने की ऐसी ही एक परम्परा ध्वस्त होने जा रही है। बाला साहब ठाकरे द्वारा कभी चुनाव न लड़ने के बाद भी महाराष्ट्र की सत्ता चलाने की परंपरा उनके पोते आदित्य ठाकरे द्वारा आज तोड़ी जा रही है। सक्रिय राजनीति में आकर चुनाव लड़ने वाले आदित्य, ठाकरे परिवार के पहले शख्स बनेंगे। आदित्य आज वर्ली सीट से अपना नामांकन दाखिल करने जा रहे है। और इसी के साथ चुनाव नही लड़ने की ठाकरे परिवार की परंपरा आज टूट जाएगी।

जब बालासाहब जिन्दा थे तब के हालात और आज के हालात में ज़मीन-आसमान का फर्क आ गया है। शिवसेना वैसे तो भाजपा की ‘आल वेदर फ्रेंड’ की तरह है 2014 के बाद से भाजपा की बढ़ती ताकत ने शिवसेना को असहज कर दिया है। महाराष्ट्र में हमेशा ‘बड़े भाई’ की तरह पेश आने वाली पेश आने शिवसेना को अबकी बार ‘छोटे भाई’ से ही संतोष करना पड़ा है। आधी सीटों पर दावा करने वाले उद्धव ठाकरे को इस बार भाजपा से कम सीटों पर चुनाव लड़ने पर सहमत होना पड़ा है।

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मुख्यमंत्री के पद पर भी अपना हक जता रही शिवसेना को अमित शाह द्वारा जोर का झटका दिया गया है। भाजपा के साथ आना शिवसेना की मजबूरी है लेकिन भाजपा के महाराष्ट्र में बढ़ते जनाधार से उनकी चिंता भी बढ़ गयी है। पहले ही कम सीटों पर चुनाव लड़ रही शिवसेना से अगर चुनाव बाद कुछ विधायक बागी होकर भाजपा या किसी अन्य दल में आ जाएं तो उनके लिए हालात बेकाबू हो सकतें है। आज के दौर में किसी पर भरोसा करना सेना के लिए मुश्किल था इसलिए उन्हे बालासाहब के वारिस को ही चुनावी रण में कुदाने का फैसला करना पड़ा।

इसके अलावा अमित शाह के नेतृत्व वाली आक्रामक भाजपा से शिवसेना थोड़ा डरने भी लगी है। आदित्य ठाकरे को सक्रिय राजनीति में लाने के पीछे भी उनकी यही मंशा है कि शिवसेना को महाराष्ट्र में मजबूती प्रदान की जाये और जनाधार बढ़ाया जाए। यही वजह है कि इस बार शिवसेना के पोस्टर मराठी के साथ अन्य भाषाओं में भी देखने को मिल रहे है। नाम के आगे ‘ठाकरे’ लगा होने से आदित्य को विरासत में जमी-जमाई राजनीति तो मिल रही है लेकिन उन्हें मेहनत करके ये सिद्ध करना होगा कि वो वाकई इस विरासत के हकदार है। नही तो उन्हें “शिवसेना का राहुल गांधी” बताने वालों की आवाज़ फिर मुखर हो जाएगी।

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– सचिन पौराणिक

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