शाज़िया के हौसले को सलाम…

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गांव में एक सेठ रहते थे। बड़ी हवेली थी, कई एकड़ जमीन और ढेर सारी गायें भी उनके पास थीं। सेठजी रोज़ शाम को महफ़िल जमाते और उस महफ़िल की जान होता था उनका नौकर ‘रामू’। सेठजी रोज़ शाम को सभी मित्रों को हवेली पर बुलाकर एक तमाशा करवाते थे। सबके सामने दो नोट जमीन पर गिरा देते थे, एक 500 का औऱ एक 10 रुपए का। फिर रामू को बुलाकर कहते कि दोनों में से कैसा भी एक नोट उठा लो। रामू हर बार की तरह 500 के नोट को छोड़कर 10 रुपए का नोट उठा लेता।

इसके बाद सेठजी ठहाका लगाकर कहते – “दुनिया चांद पर पहुंच गई, लेकिन इस गंवार को यह नहीं पता चला कि कौन-सा नोट उठाना चाहिए?’ सेठजी की उस महफ़िल में मणिलाल नाम का एक सुनार भी रोज़ शामिल होता था। एक दिन बाज़ार में मणिलाल को रामू दिख गया। मणिलाल ने तुरंत उसको बुलाकर पूछा कि सालों हो गए रामू, लेकिन तुम्हें 10 रुपए और 500 रुपए के नोट में फर्क पता नहीं चला? क्या तुम्हें सच में यह अंतर पता नहीं चलता? रामू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि मुझे सब मालूम है सेठजी, लेकिन जिस दिन मैंने 10 के नोट की जगह 500 का नोट उठा लिया, उस दिन यह खेल ही खत्म हो जाएगा।

खबर आई है कि हरियाणा के यमुनानगर से जहां तीन बच्चों की मां ‘शाज़िया’, एक कागज़ पर तीन तलाक लिखकर अपने प्रेमी के साथ भाग गई। इस पर महिला के पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। इस शिकायत पर पुलिस ने उसे ढूंढकर कोर्ट में पेश किया, जहां उसने कहा, “मैंने इस्लामिक रीति-रिवाज़ से अपने पति को तलाक़ दे दिया है। मेरा पति शराब पीकर मुझसे मारपीट करता है, जिससे मैं तंग आ चुकी हूं और अब प्रेमी के साथ ही रहना चाहती हूं।” तीन तलाक पर अभी कोई कानून न होने की वजह से पुलिस असमंजस की स्थिति में है और इसलिए उन्होंने महिला के पति को सलाह दी है कि वे कोर्ट में याचिका लगाएं, जिससे कोई आदेश पारित हो सके। पति का यह भी आरोप है कि शाज़िया अपने साथ शौचालय बनाने के लिए रखे गए 60 हजार रुपए भी साथ लेकर गई है।

शाज़िया के इस तरह अपने पति को तीन तलाक़ देना सुर्खियां बना हुआ है क्योंकि आमतौर पर तीन तलाक से मुस्लिम महिलाएं ही ज्यादा त्रस्त होती हैं। शाज़िया ने जिस हिम्मत के साथ अपने ऊपर हो रही ज्यादतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई है, वह काबिलेतारीफ है, लेकिन इन सबके बीच असली सवाल यह है कि समानता के इस दौर में मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का दर्जा आखिर क्यों न मिले? एक देश में मज़हब के आधार पर दोहरे कानून क्यों?

संविधान के लिए सभी भारतीय महिलाएं एक बराबर क्यों नहीं? तीन तलाक के मुद्दे पर राजनीतिक दल अपनी राय स्पष्ट क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या मुस्लिम महिलाओं के सुरक्षित भविष्य से ज्यादा उनके लिए अल्पसंख्यक मत ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं? इतने सालों से चली आ रही यह गलत परम्परा कैसे खत्म हो सकती है, इसकी राह शाज़िया ने देश को दिखा दी है। जिस तरह सेठजी के खेल की रामू एक मिनट में हवा निकाल सकता है, ठीक उसी तरह इस गलत परम्परा की मुस्लिम महिलाएं एक मिनट में हवा निकाल सकती है। तीन तलाक के इस खेल में जिस दिन मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक देने शुरू कर दिए, उसी दिन से यह परंपरा ख़त्म हो जाएगी। ‘आप करें तो जायज़ और कोई दूसरा करे तो नाजायज़’ वाली पुरुष सत्तात्मक सोच को शाज़िया जैसी महिला ने करारा तमाचा मारा है।

मुस्लिम महिलाएं चाहे जिस दिन रामू की तरह सेठजी के खेल को बंद करवा सकती है। बस थोड़ी सी हिम्मत, हौसला और सच्चा प्यार मुस्लिम महिलाओं का जीवन बदल सकता है। शाज़िया के हौसले को सलाम।

-सचिन पौराणिक

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