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Talented View : तो उनकी आवाज़ राजनीति में ‘खामोश’ हो जाएगी

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बुद्धिजीवियों की यह समस्या होती है कि वे कभी एकमत नहीं हो पाते हैं। बात सही भी है। बुद्धिमानों को समझाना दुष्कर कार्य है, लेकिन साथ ही बुध्दिजीवी यदि महत्वाकांक्षी भी हो जाए, तब हालात और बदतर हो जाते हैं। इन परिस्थितियों में व्यक्ति को कभी संतोष प्राप्त नहीं हो पाता है। चाहे वे शहर बदल लें,  नाम बदल लें,  काम बदल लें,  पार्टी बदल लें, लेकिन उसके अंदर एक व्यग्रता बनी ही रहती है। ऐसे व्यक्ति को कोई कितना ही समझा ले, किन्तु वह हालातों से दु:खी ही रहता है। वह अपने साथ वालों को ही कोसने लगता है और उन्हें ही अपनी उन्नति की राह का रोड़ा समझने लगता है।

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फायर ब्रांड नेता शत्रुघ्न सिन्हा अब कांग्रेस में है। झंडे का रंग उन्होंने बदल लिया है, लेकिन उनका जो चरित्र है, वह बिल्कुल नहीं बदला है। बुद्धिजीवी ऊपर से महत्वाकांक्षाओं से भरे शॉटगन का व्यवहार बिल्कुल वही है। जब शत्रु भाजपा में थे, तब उन्हें नीतीश कुमार प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद आते थे। इसके बाद जब जेडीयू-भाजपा का गठबंधन हो गया तो शत्रु को राहुल गांधी में संभावनाएं नज़र आने लगी, लेकिन अब जब शत्रु खुद कांग्रेस में है तो उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अखिलेश और मायावती सबसे उपयुक्त नज़र आने लगे हैं। शत्रु के कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही उनकी पत्नी समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई। शत्रु अब पटना साहिब से कांग्रेस के टिकट पर ताल ठोंक रहे हैं तो उनकी पत्नी सपा के टिकट पर लखनऊ से। पत्नी की नामांकन रैली में भी शत्रु शान के साथ शामिल हुए और यह जतला दिया कि वे पार्टी के अनुशासन को ठेंगे पर रखते हैं।

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उनकी इस हरकत से तिलमिलाए लखनऊ से कांग्रेस प्रत्याशी आचार्य प्रमोद कृष्णन ने उन पर तंज कसा। आचार्य ने कहा कि शत्रु ने ‘पत्नीधर्म’ तो निभा लिया, अब ‘पार्टीधर्म’ भी निभाएं और लखनऊ से कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार करें।  शत्रु की ऐसी हरकतों पर भाजपा वाले सबसे ज्यादा खुश हो रहे हैं। वे यह देखकर खुश हैं कि कल तक उनके गले में बंधी घंटी अब कांग्रेस के गले पड़ चुकी है। अब उनकी हरकतें कांग्रेस को संताप दे रही है। शत्रु को समझना होगा कि उनके पास राजनीति के विकल्प बेहद सीमित हैं। पटना साहिब से यदि वे चुनाव हारते हैं तो इससे उनके राजनीतिक जीवन का अंत हो सकता है। शायद शत्रु यह बात समझ भी गए है इसलिए उन्होंने पत्नी को लखनऊ से सपा का टिकट दिलवाया है। अपने फिल्मी सफर में शत्रु ने अमिताभ के साथ कुंठा रखी। गाहे-बगाहे वे अमिताभ पर तंज़ कसते रहे और खुद को उनसे बेहतर कलाकार समझने लगे। राजनीति में आने के बाद वे खुद को बाकी नेताओं से बेहतर मानने लगे।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से वे खुद को पार्टी से बड़ा मानने लगे और हर मौके पर पार्टी लाइन से अलग हटकर बयान देने लगे। वर्तमान में शत्रु कांग्रेस में हैं और शायद इसीलिए अब उन्हें राहुल गांधी भी पसंद नहीं आ रहे हैं। मायावती, अखिलेश जैसे क्षेत्रीय नेता उन्हें प्रधानमंत्री पद के काबिल लगने लगे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा बुद्धिजीवी हैं, यह बात सही है, लेकिन अपनी अति महत्वाकांक्षा के चलते वे कहीं एडजस्ट नहीं हो पा रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि बड़े से बड़े नेता को भी पार्टी की विचारधारा के दायरे में रहकर ही काम करना होता है।

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अपने आप को पार्टी से ऊपर समझने की कीमत उन्हें कभी भी चुकानी पड़ सकती है। भाजपा में नरेंद्र मोदी का विरोध करके वे फिर भी कुछ साल पार्टी में रह लिए, लेकिन राहुल गांधी का विरोध करने पर उन्हें कांग्रेस तुरंत बाहर का रास्ता दिखला देगी। यही हाल कमोबेश हर पार्टी का है। विरोध के स्वर कोई नेता पसन्द नहीं करता। ऐसे में यदि पटना से इस बार शत्रु हारे तो उनकी आवाज़ राजनीति में हमेशा के लिए ‘खामोश’ हो सकती है।

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