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Talented View : देखते हैं भोपाल की जनता हिंदुत्व या सेक्युलरिज़्म में से किसे चुनती है?

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पहले के लोग ज्यादा खुश क्यों रहते थे? क्यों उनके चेहरे पर एक मुस्कान रहती थी? संघर्ष, गरीबी और अभावों के बीच भी वे प्रसन्न कैसे रह लेते थे ? इन बातों का जवाब छुपा है उनके जीवन के संघर्षों में। पुराने लोगों का बचपन इतना संघर्षमय होता था कि उस लेवल से तुलना करने पर आज की परिस्थितियां उन्हें सदा ही बेहतर दिखाई देती थी। पांव में रबर की स्लीपर पहनकर भी वे लोग इसलिए खुश हो लेते हैं क्योंकि पहले वे नंगे पांव ही घूमते थे। जैसे जनरल बोगी में यात्रा करने वाले के लिए स्लीपर श्रेणी लक्ज़री होती है, लेकिन वही स्लीपर कोच एसी में यात्रा करने वालों के लिए किसी यातना से कम नहीं होता।

Talented View : …तो साध्वी प्रज्ञा का विरोध करने का उन्हें कोई नैतिक हक नहीं

कहने का मतलब इतना ही है कि खुशी या दु:ख परिस्थितियों पर नहीं बल्कि सोच पर निर्भर करती है। यह सोच वक्त के साथ बदल जाती है। भारतीय राजनीति की बात करें तो भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी को कट्टरपंथी माना जाता था जबकि अटलबिहारी वाजपेयी को नरमपंथी। उनकी इस छवि के चलते ही बाकी दल आडवाणी की जगह अटलजी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर सहमत हुए और आडवाणी “पीएम इन वेटिंग” रह गए।

बहरहाल, चर्चा यही है कि वर्तमान हालातों की तुलना जिस जगह से खड़े होकर की जाती है, वही सुख और दु:ख के बीच का एकमात्र भेद है। अटलजी के राजनीतिक जीवन से संन्यास और नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के राजनीति में प्रादुर्भाव के साथ ही आडवाणी (Lal Krishna Advani) की छवि नरमपंथी की हो गई जबकि कट्टरपंथी नेता की छवि में मोदीजी शामिल हो गए। इसके बाद मोदीजी ने योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया तो अब देखने वालों को मोदीजी भी नरमपंथी लगने लगे।

Talented View : “चौकीदार चोर है” का जवाबी नारा शायद हो गया तैयार

योगी की आक्रामक और कट्टर हिंदुत्व की छवि के कारण ऐसा संभव हो पाया, लेकिन वक्त कहीं भी कहां ठहरता है? साध्वी प्रज्ञा (Sadhvi Pragya Thakur) को भोपाल से उम्मीद्वार बनाने के बाद सेक्युलर, लिबरल, अति बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्षता वालों की हालत खराब हो गई है। साध्वी प्रज्ञा के तेवर देखते हुए इस गैंग को अब योगी आदित्यनाथ भी ‘अच्छे’ लगने लगे है। सेक्युलर ये समझ रहे हैं  कि इस प्रकार सीढ़ी दर सीढ़ी उनका एजेंडा पीछे होता जा रहा है और हिंदुत्व आगे बढ़ता जा रहा है। सेक्युलरों की बड़ी तकलीफ यही है कि कहां तो वे आडवाणीजी का भी विरोध करते थे और अब योगी आदित्यनाथ को भी स्वीकार करना पड़ रहा है। वे यह समझ रहे हैं कि अगर साध्वी प्रज्ञा भी भोपाल से जीत जाती हैं तो यह हिंदुत्व की एक और जीत होगी।

सेक्युलरों का धर्मनिरपेक्षता वाला एजेंडा फीका पड़ जाएगा और कोई उनका नामलेवा भी नहीं बचने वाला। भोपाल में दिग्गी राजा (Digvijaya Singh) के समर्थन में इसीलिए जावेद अख्तर (Javed Akhtar), सीताराम येचुरी (Sitaram Yechury) और स्वरा भास्कर (Swara Bhaskar) जैसे “सेक्युलर गैंग” के लोग आकर प्रचार कर रहे हैं। साध्वी के खिलाफ उनके ‘विष वमन’ से यही संकेत मिल रहे हैं कि इस गैंग की हालत बहुत खराब हो गई है। साध्वी को ये लोग किसी कीमत पर संसद नही पहुंचने देना चाहते हैं ।

कम्प्यूटर बाबा (Computer Baba) का दिग्गी के लिए प्रचार करना भी यही दर्शा रहा है। दिग्गी समझ चुके हैं कि हिंदुत्व के मुद्दे पर अगर ध्रुवीकरण होता है तो साध्वी का जीतना पक्का है। हिंदुत्व के हथियार की ‘काट’ के लिए ही दिग्गी साधु-संतों के साथ भगवामय हो चुके हैं। मंदिर-मंदिर घूम रहे दिग्गी राजा भूले से भी मस्जिद या दरगाह की तरफ रुख नहीं कर रहे है। अल्पसंख्यक वोट इस बार भोपाल में पूरी तरह लावारिस दिखाई पड़ रहा है। “भगवा आतंकवाद” की बात करने वाले दिग्विजयसिंह भोपाल में “जय श्रीराम” और “जय नर्मदा मैया” के नारे लगाते घूम रहे है।

भोपाल (Bhopal Lok Sabha Seat) का मुकाबले कांटे का दिखाई दे रहा है, लेकिन मोदी, योगी और शाह की रैलियां जनता का रुख मोड़ सकती है। सेक्युलर गैंग की कुलबुलाहट से यह संदेश भी जा रहा है कि भोपाल का मुकाबला वाकई में कड़ा है। साध्वी के जीतने की स्थिति में सेक्युलर ब्रिगेड को अगले झटके के लिए तैयार होना पड़ेगा। आडवाणी से लेकर साध्वी प्रज्ञा तक सेक्युलर गेंग पहले ही कई झटके खा चुकी है। सेक्युलर गैंग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और साध्वी प्रज्ञा के जीतने पर हिंदुत्व का उदय होना पक्का है।

Talented View : जनता को इनके मंसूबे कामयाब नहीं होने देने चाहिए

आज के हालातों को देखा जाए तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी के पांच सालों में हिंदुत्व का उदय हुआ है। योगी आदित्यनाथ और अब साध्वी प्रज्ञा को आगे करके मोदी ने हिंदुत्व को बदनाम करने वाली शक्तियों को साफ संदेश दे दिया है। तुष्टिकरण की राजनीति को पूर्ण विराम देने की दिशा में यह एक अच्छा कदम है। भोपाल से साध्वी की जीत होती है तो यह घटना भारतीय राजनीति की आगे की दिशा तय करने वाली होगी। भोपाल की जनता पर देश की राजनीति को दिशा देने की जिम्मेदारी आ गई है। देखते हैं भोपाल की जनता हिंदुत्व या सेक्युलरिज़्म में से किसे चुनती है?

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